श्रद्धा से शीष झुकाते
श्रद्धा से शीष झुकाते, हम गाते हैं गुणगान। आदि तीर्थंकर ऋपभ प्रभु का, है पावन अभियान ॥टेकः॥
१. मरुदेवा माता के, नन्दन प्यारे। श्री नाभिराजा के, कुल उजियारे। तुमसे जनता ने पाया, असि मषि कृषि का जो ज्ञान ॥
२. प्रभुवर ने राज्य छोड़ा, ली श्रमण दीक्षा । एक बरस तक, मिली नहीं भिक्षा। उस युग की जनता सारी, भिक्षा विधि से अनजान ॥
३. श्रेयांस ने ही प्रभु को, पारणा कराया। प्रथम दान देने वाला, धन्य वो कहलाया। वह दिवस आज का उत्तम, इक्षुरस का था दान ॥
४. देव दुंदुभि बजी है, चकित लोग सारे। रत्न पुष्प बरसे नभ से, भव्य वे नजारे। वर्षी तप के यों प्रेरक, श्री ऋषभदेव भगवान ॥
तर्ज : सावन का महीना