तप की ज्योति में तपकर
(लय: कल्पतरू रा बीज फल्या)
रचयिता : साध्वी निर्वाणश्रीजी
तप की ज्योति में तपकर, आत्मा बनती है कुन्दन। तप की महिमा है भारी, तप से टूटे अघ बंधन ।।
है धर्म निर्जरा संवर, मिलती मंजिल मनचाही,
टूटे बेड़ी कर्मों की, मिट जाए भव की त्राही।
लक्षित मग में गतिमय हो, यह मिला तपस्या स्यंदन ।।
पाए अनुपम गणमाली, गणमंदिर अपना पावन,
तपधारी मुनि-सतियों का, तप वर्णन है मन-भावन। सौभागी हमने पाया, देव रमण वन नंदन ।।
तप अनुष्ठान लख तेरा, पुलकित है परिजन सारे
, कुल पर शुभ कलश चढ़ाया, गूंजे चिहुं दिशि तप नारे। परिजन मिलकर के करते, तेरा मंगल अभिनंदन ।।
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