हँसा निकल गयो काया
हँसा निकल गयो काया से खाली पड़ी रही तस्वीर,
पड़ी रही तस्वीर खाली पड़ी रही तस्वीर ।।
वही नयन मुख वही नासीका वही भ्रकुटि वही वीर,
वही देह और वही धरणी, पर उड़ गया पंछी पीर ।। १ ।। मात-पिता और बहिन भाणजी, कहे विलायो वीर,
जला-तली देकर कहे सारा, टुटया हम-तुम सीर ।। २ ।। सीढ़ी पर सीधों पोढ़ायो और उड़ायो चीर,
च्यार जणा मिल कांधे धरकर, ले गये गंगा तीर ।। ३ ।। आंके बांके लकड़े चांके, छिड़कायो कुछ नीर, जंगल जाकर चीता जलाई, कह गये दास कबीर ।। ४ ।।