तर्ज:- (सात अजूबे इस दुनियाँ में)
हे प्रभु पार्श्वनाथ सदा हम बोले जय जय तेरी,
भव सागर से पार करो, अब नाथ करो ना देरी.
जय जय हो जय जय हो जय जय हो ॥
कमठ योगी का तँ ने मान मिटाया था.
जलते नाग और नागिन को बचाया था,
तेरी महिमा अपरमपार प्रभु,
हम सबका करो उद्धार प्रसु. अब जैसे भी हो काटो हमारे, जन्म मरण की फेरी ॥ १ ॥
अपने ही हाथों से बिछाये अँगारे,
अपने ही कर्मों से बने हम दुःखियारे,
अब तेरे सिवा कहाँ जायें, हम छुटकारा कैसे पायें ये क्रोध, मान और माया लोभ ही, चार बड़े हैं बैरी ॥ २ ॥
हे करुणा के सागर हे मुक्तिदाता, “वीर मंडल” तो सदा, तुम्हारे गुण गाता. तू दाता हम तो भिखारी हैं, तु भगवन् हम तो पुजारी हैं, ना दूजा कोई सहारा जग में, हारे हेरी-हेरी ॥ ३ ॥