जिन शासन तेज बढ़ाया रे
(लय : कैसी वह कोमल काया रे…)
जिन-शासन तेज बढ़ाया रे, तीर्थंकर भगवान, हे कल्पवृक्ष की छाया रे, तीर्थंकर भगवान,
कितनों को पार लगाया रे, तीर्थंकर भगवान।
अर्हत् है महिमा शाली, प्रवचन की छटा निराली, द्वादश गुण रूप कहाया रे, तीर्थंकर भगवान ।
है सिद्ध मुक्त अविकारी, शुभ आठ गुणों के धारी, है चिन्मय चेतन काया रे, तीर्थंकर भगवान।
आचार्य संघ के प्रहरी, उनमें हो निष्ठा गहरी, छत्तीस गुणों को पाया रे, तीर्थंकर भगवान।
है उपाध्याय श्रुतधारी, जिनवाणी के अधिकारी, पच्चीस गुणों की माया रे, तीर्थंकर भगवान।
मुनिपद है सबसे सुंदर, है छुपी शक्तियां अंदर, गुण सप्तवीस सुहाया रे, तीर्थंकर भगवान।
भिक्षु ने बाग लगाया, तुलसी ने उसे सजाया, अब महाप्रज्ञ का साया रे, तीर्थंकर भगवान।