Karmo Ki Chal Nirali Hai

चाल कर्म की

(लय : यदि भला किसी का कर न सको तो)
कर्मों की चाल निराली है, ये बात सभी ने मानी है ना जाने कब ये जाय बदल, इसकी गति तो अनजानी है
जबसे सृष्टि का रुप बना, जीवन-मृत्यु का दौर चला, तबसे कर्मों का ये चक्कर, जग के जीवो के साथ चला कोई भी इनसे बच न सका, गर ना समझो नादानी है
कई चन्दन बालाए जन्मी, कई सेठ सुदर्शन हुए यहाँ ग्वाले और कर्मठ योगी से भी, नर और गरु थे कहाँ कहाँ इनका ये भला बुरा बनना, बस कर्मों की ही कहानी है।
कर्तव्य के पथ पर दूट रहना, हम मानव का है धर्म सही ये भक्त मंडल के बालक भी कहते है सबसे बात यही तप, ध्यान, धर्म और सच्चाई, शुभ कर्म रुप मे पानी है।

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