• के करै भरोसो काल रो
(लय : आ बाबासा री लाड़ली…….)
के करै भरोसो काल रो अणचिन्त्यो आवैला,
ओ माटी रो महल एक पल में ढह ज्यावैला।
बड़ा-बड़ा मनसूबा बांधै ऊंची भरै उड़ान रे,
अपणी मो में बण्यो बावलो भूल गयो भगवान रे
सूरज से जीवन ने ओ राहू गह ज्यावैला ।
समै-समै पर धक्को लागै नींव निसरती ज्यावै रे,
बढ्यो नीर रो वेग नदी सरणाटा करती आवै रे,
कांठे खड्यो रूंखड़ो पतो न कद बह ज्यावैला।
चल्या गया केइ, केइ जासी, केइ जावण री त्यारी में,
नगद उगावै रकम, इंनै विश्वास न तनिक उधारी में,
तकै बाज ज्यू झपट चिड़कली के सह पावैला।
निश्चै नहीं पलक रो आगे कुण जाणै के होसी रे,
फल पावेला बिसा जिसा तूं बीज हाथ स्यूं बोसी रे,
बगत बीत ज्यासी कोरी बातां रह ज्यावैला।
अणमोलो ओ ‘मधुकर’ मिलियो हीरो क्यूं ठुकरावै रे, लोहबाणिये ज्यू बण जिद्दी क्यूं निज शीश हिलावै रे, संपदा रा साथी न विपद में मुह दिखावैला ।