निहारा तुमको कितनी बार :-
लय : जगाया तुमको कितनी बार.
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निहारा तुमको कितनी बार – २
जितनी बार निहारा हारा – २, कहीं न पाया पार ॥ निहार….
शास्त्र-सिन्धु में देखा तरते, तल तक गहरे नीर उतरते – २
रत्न अमूल्य हस्तगत करते,
देखा हमने बड़े गौर से – २, भरते गण-भंडार ॥ निहारा……
कभी तपोवन में तुम आये, आतापन भूमी में पाये – २
प्राणार्पण संकल्प सझाये,
तीव्र-प्रेरणा-प्रेरित फिर से – २, करते धर्म प्रचार ॥ निहार…..
सराबोर चर्चा में रहते, अपने शुभ प्रवाह में बहते – २ सत्य स्पष्ट भाषा में कहते,
सहते कुवचन-वचन कहीं – २, सहते घूसों की मार ॥ निहार….
करते सीधी-सादी बातें, गहन तत्व झट से समझाते – २ तार निकाल तुरंत दिखलाते,
अरे हेम! यों क्यों करते हो – २, आपस में तकरार ? निहार…..
कड़े-कड़े दृष्टान्त सुनाते, जड़ से मिथ्या-रोग मिटाते – २ जिन-वाणी की अलख जगाते,
कहीं नहीं भय खाते, शम दम – २, गम खाते हर बार ॥ निहार…
कभी संघ सारण-वारण में, विधि-विधान के निर्धारण में – २ परिचर्या विधिवत कारण में,
तारण-तरण, शरण-अशरण के – २, निराधार-आधार ॥ निहारा…..
कवि, लेखक वक्ता, व्याख्याता, आगम-सूत्त्वों के उद्गाता – २ तेरापंथ के भाग्य विधाता,
अयि भिक्षो! क्या गाएं ‘तुलसी’ – २, महिमा अपरम्पार ॥ निहारा….