तर्ज :–(सागर किनारे )
पाश्च जिनन्दा, आनन्द कन्दा,
दो ज्ञान ऐसा जीवन, यूं हीं ना गंवाये, हो हो हो
पाश्च जिनन्दा ।
संसार सागर में, हम गोते खाते,
अज्ञानता वश, नहीं पार पाते,
करके दया अब तूं ही, राह दिखाये ।। १ ।। पाश्व जिनन्दा ।।
सदा सत्य बोलें हम, झूठ को त्यागें,
पाप कर्म से, दूर हो भागें,
सदाचारी बनकर जीवन, अपना बितायें ।। २ ।। पाश्व’ जिनन्दा ।।
जैसे भी हैं हम. तेरे पुजारी,
रखना तू ही अब, लाज हमारी,
वीर मंडल” तेरे, गुणगान गाये ॥ ३ ॥ पाश्व जिनन्दा ||