(लय : चैत्य पुरुष जग जाए)
संयममय जीवन हो।
नैतिकता की सुर-सरिता में, जन जन मन पावन हो।
संयममय जीवन हो।
अपने से अपना अनुशासन, अणुव्रत की परिभाषा
वर्ण जाति या सम्प्रदाय से, मुक्त धर्म की भाषा।
छोटे-छोटे संकल्पों से, मानस परिवर्तन हो ॥१॥
मैत्री भाव हमारा सबसे, प्रतिदिन बढ़ता जाएं,
समता, सह-अस्तित्व, समन्वय-नीति सफलता पाएं।
शुद्ध साध्य के लिए नियोजित, मात्र शुद्ध साधन हो ॥२॥
विद्यार्थी या शिक्षक हो, मजदूर और व्यापारी,
नर हो नारी बने नीतिमय, जीवन चर्या सारी।
कथनी करनी की समानता में, गतिशील चरण हो ॥३॥
प्रभु बनकर के ही हम प्रभु की, पूजा कर सकते हैं। प्रामाणिक बनकर ही, संकट-सागर तर सकते हैं।
आज अहिंसा शौर्य-वीर्य, संयुक्त जीवन-दर्शन हो ॥४॥
सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, राष्ट्र स्वयं सुधरेगा, ‘तुलसी’ अणु का सिंहनाद, सारे जग में पसरेगा।
मानवीय आचार संहिता में अर्पित तन मन हो ॥५ ॥
संयममय जीवन हो ॥