तप की महिमा अनुपम जग में
(तर्ज – दिल लुंटने वाले जादूगर…. )
रचयिता : साध्वी अणिमाश्री
तप की महिमा अनुपम जग में, सब तप का गौरव गाते हैं। तप की नौका में बैठ सभी, इस भव-जल को तर जाते हैं।
है तेज भरा तप में अद्भुत, तप जीवन को चमकाता है । कर्मों का कचरा जल जाता, चेतन चिन्मय बन जाता है । यह पावस की बेला अनुपम, सब तप की भेंट चढ़ाते हैं ।।१ ।।
फल जाते चिर इच्छित सपने, जब तप के अभिनव फूल खिले। समता का स्नेह नीर पाकर, बुझते फिर कितने दीप जले । वे सफल बने जीवन के पल, जो तप में ही लग जाते हैं ।। २ ।।
लग रहीं तपस्या की झड़ियां, जुड़ रहीं नई फिर ये कड़ियां । आ रही दिवाली तप की ही, तुम मिलकर छोड़ो फुलझड़ियां । तप-जप के ये उज्ज्वल मोती, जीवन की आब बढ़ाते हैं ।।३।।