Tap Ro That Lagao

तप रो ठाट लगाओ सावण में

(तर्ज – बादलियो आंखड़ल्या में.)
रचयिता : साध्वी अणिमाश्री
तपस्या रो मौसम आयो, हां मौसम आयो ।
रंग नयो ओ ल्यायो है, जन-जन में ।
तपस्या करणी है अब तो कमरां कसल्यो, कमरां कसल्यो ।
जोश घणो उमड़ायो है जन-जन में ।।
जनम जनम रा पातक सारा, तपस्या स्यूं धुलसी ।
बारणा मुगती रा देखो, झटपट खुलसी ।
अभिनव उत्सव आयो है, जीवन में ।।
तपस्या री महिमां गावै, ओ सारो संसार है ।
तपस्या ही ई जीवन रो, साचो सिणगार है ।
तप रो फूल खिलायो है, उपवन में ।।
तपस्या री उज्ज्वल ज्योति, च्यानणियो नव भरसी ।
तपसी है जीवन री सब, विघ्न-बाधा हरसी ।
कल्पतरु लहरायो है आंगण में ।।
थारो मन में पक्की अबकै, अट्ठाई तो करणी है ।
मासखमण अरु पखवाड़ा स्यूं, म्हारी झोली भरणी है।
तप रो ठाट लगायो है, सावण में ।।’
तपस्या री आंच स्यूं आ काया कुंदन बण ज्यासी ।
तप नौका में बैठणवालो, भव सागर नै तर ज्यासी ।
“अणिमा” गीत सुणायो है, पुलकन में ।।

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