तू आयो है एकलो
(लय : आभै चिमके बिजली)
तँ आयो है एकलो रे भाई जासी एका एक।
कोई न सागे चालसी – तू करलै जरा विवेक ।
देख हालत औरां की रे – करे क्युं थारी म्हारी रे ॥
क – अन्तर ज्ञान जगाले – जगत में साथी नहीं है कोई थांरो।
सगला भुगते आपरी भाई – करणी आपो आप।
गहराई स्युं सोचले तँ – कुण बेटो कुण बाप।
खाडखणासी सो पड़सी रे – जहर खासी सो मरसी रे।
क – अन्तर ज्ञान जगाले जगत में साथी नहीं है कोई थारो ॥१ ॥
रहणो अपणे आप में भाई – ज्युं जंगल रे कैर
ना कोई स्युं मित्रता है – ना कोई स्युं बैर मस्त है अपणी धुन में रो – मौज एकाकी पन में।
क – अन्तर ज्ञान जगालै – जगत में साथी नहीं है कोई थांरो ॥२ ॥
सुपन में भी सुख नहीं जो पावै – पर आधी न आठ पहर आनन्द में – है सदा सुखी स्वाधीन ।
रहे निज गुण में रमतारे – आपरो आपो दमता रे।
क- अन्तर ज्ञान जगालै – जगत में साथी नहीं है कोई थांरो ॥३ ॥
मूल सकल संघर्ष रो है – द्वैत भाव अवलोय ।
नमि ज्यु एकाकी भलो कोई दोय मिल्यां दुःख होय ।
एकता सदा सुहावै रे – भावना तुलसी भावै रे । क- अन्तर ज्ञान जगाले जगत में साथी नहीं है कोई थारो ॥॥