Mahapragy Abhivandana(Kavita)

महाप्रज्ञ के अभिनन्दन में क्या उपहार चढाऊं
तन -मन-जीवन किया समर्पित, सत-संस्कार जगाऊं
 कालू कर से तुमने पाई, संयम सुर तरू छाया
तुलसी के चरणों में तुमने ज्ञान  सुधारस पाया
 जीवन की वे स्वर्णिम, घड़ियां मैं कैसे बतलाऊं
 सृजनशीलता अनुपम, अद‌भुत, काम कमाल किया है संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी का साहित्य विशाल किया है महाप्रज्ञ की प्रज्ञा का, कैसे अन्दाज  लगाऊं। 
प्रेक्षाध्‌यान साधना का खोला अति उत्तम है द्वार 
जीवन विज्ञान आज की शिक्षा का आधार 
गुण अनेक है जीभ एक है, कैसे गौरव गाँऊं
 
किया समर्पण  तन-मन जीवन, तुलसी के चरणो  में तुलसी का अवदान  व्यक्त होता न कभी वर्णो में।
दो वरदान मुझे भी ऐसा मैभी कुछ कर पाऊं
 संघ हमारा सौभागी है मै भी हूं सौभागी 
संघ शरण मे आया ‘जिनसे किस्मत मेरीजागी 
संयम पथ पर बढूं निरन्तर यही भावना भाऊं 
श्रद्धा वन्दन लो अभिनन्दन बंधन मेरे काटो
 महाप्राण तुम महाप्रज्ञ जन-मन की खाई पाटो
 आशीरवर दो अंतर्यामी, निज चैतन्य जगाऊ

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top