समणी मंजुल प्रज्ञा जी
मेरे निष्फल हो सब पाप हृदय हो साफ
भावना भाऊं जीवन को सफल बनाऊ ।।
①यदि हिंसा त्रस स्थावर की
यदि पीड़ा किसी जीव को दी
करती पश्चाताप पाप धो पाऊं
② औरो की चीज चुराई हो ।
की खोटी अगर कमाई हो।
अपनी आत्मा को में बुरी बताऊँ
यदि झूठ कभी भी बोला हो
यदि माया का विष घोला हो । हो।
। क्षमा करे में सबको आज खमाऊं
4 यदि बही लोभ की धारा में।
यदि फंसी मोह की कारा में
आत्मस्थित हो ममता को दूर हराउं
गुरूवर का अवगुण बोला हो
यदि शंका से दिल डोला हो बनकर निश्छल श्रद्धादीप जलाऊ