शासन से सबसे बड़ा दुनिया का सरताज है
प्राणों से प्यारा रा गण है हमारा इसपर हमें नाज है।
बनकर हिमालय देता है पहरा नदिया उफनती तो ने बांध है।
शोख छटाओं में गम की घटाओं में सम का पढ़ायें वो पाठ यही है
तिरछी हवाओं मे बहकी फिजाओं में पार जो उतारे वो घ घाट यही है।
मर्यादा पालने यहाँ जीने का अन्दाज है।
② गण एक मन्दिर आचार्य ईश्वर इनके सहारे से संयम फले
मंजिल मिलेगी यह बात तय है इन केइशारो पे चलते चले
तन के भूलावों में मन के छलावो में
चाहे जो करले विधान नहीं है
खुद को खपायेगे, खुद को तपायेगें अमृत को पाने का स्थान यहीं है
विनयी बन सेवा करे बढने का यह राज है
③ सागर से गहरा गण है हमारा कलियुग में सतयुग
की पहचान हैं
स्वर्गिक सुखो का संगम यहाँ पर धरती पे नन्दन उद्यान है
भव्य बहारों में नव्य नजारो में गणकी रोशनी का हिसाब नहीं है.
राग सितारों में भरके हजारों में पूरे गुण गाऊं किताब नहीं है।विनयी बन सेवा करे बढ़ने का ये राज़ है