(लय- धर्म की लौ जलाए हम)
संत है गंगा धार समान -2
इसमें प्रतिपल स्नान करे वह बनता सदा महान
④ जहाँ -२ बहती गंगा वहा सदा हरियाली,
संत चरण टिकते ही आजाती अद्भुत खुशहाली
सरस धरा बनती हो जाता पौरुष भी फलवान
② सहज और अपनी गति से बहती यह पावन धारा तरने वाले को दिखला देती है सदा किनारा
अवसर खोया, सबकुछ खोया कहाँ शांत रसपान
③ गंगा की धारा, मिल जाती महासिन्धु में जाकर
संत सुरसरी के संगम से घट घट बने उजागर
सत्य शिवं सुन्दर पथ के मिटते सब व्यवधान