(लय ना कजरे की धार)
तारो तारण हार, प्रभु करुणा के अवतार
मै खड़ा तुम्हार द्वार नैया पार लगादो
ओ प्राणो के के आधार ओ जीवन के श्रृंगार
है जुड़ी से तुझे तुम्ही से तार, सोयी शक्ति जगादो
① लाखों को तुमने तारा, तोड़ी कर्मो की कारा
हो ज्योति पुंज प्रभुवर तुम हरते जगका अंधियार
शरण आया मै तुम्हारी सुनलो नाथ पुकार
• ओ तीन भुवन के स्वामी मेरी आखों में बस जाओ
साक्षात् दरशन दे दो तुम इतना न मुझे तरसाओ
सपने में रंग भरदो प्रभु मानूंगा उपकार ।
सब कुछ चरणों में अर्पित तुम ही होसब कुछ मेरे
मोहन गारी मूरत को में ध्याऊँ सांझ सबेरे
खुला रहता परम प्रभु का सबके खातिर द्वार।