(विदाई गीत -करो तुम कर्म निभर्य हो)
सुखद हो आपकी यात्रा विदाई के ये पल आये
समपर्ण ज्ञानशाला का यहीं उपहार हम लाये ।
बीत गये दिलं पुण्य पावन दौड़ चरणों में आतेथे अलौकिक देशना पाकर धर्म रस में नहाते थे।
मुनि श्री (आपसे) मिली उर्जा शब्द नहीं कैसे कह पाये
आपकी कार्यशालाएं प्रेरणा देती
किया जादू। भरी संगीत से शक्ति
करो वादा जल्दी आना यही हम भावना भाएं
(लय- तुम्ही मेरे मन्दिर)
विदाई ये आई बिना रे बुलाई।
देख विदाई आँख भर आई ।।
① निर्मल गुलाब जैसा चेहरा है सुन्दर
पीयूष झरता मुखडा शशी तुल्य शीतल
निर्मल ज्ञान गंगा आपने बहाई
अविनय अशातना हुई जो अगर हो ।
सेवा समर्पण की धार ना बही हो
देना क्षमा तो हमको क्षमा सिन्धु ताई ।।