अनशन (संथारा)
अनशन की पूर्व भूमिका को संलेखना कहते हैं। संलेखना से आत्मा को शुद्ध कर ने के पश्त्चात शारीरिक क्षमता व मनोबल देखकर संथारा (अनशन) किया जाता है। संथारा दो प्रकार का होता हैं:-
१. सागारी संथारा (थोड़े काल के लिए)
२. यावज्जीवन संथारा (पूर्ण जीवन के लिए)
सागारी संथारा
जब कोई अचानक संकट काल आ जाए या बीमारी आदि की भयंकरता हो, उस समय सागारी संथारा किया जाता है। रात को सोते समय भी प्रातःकाल उठने तक सागारी संथारा किया जाता है। इसके लिए निम्नोक्त विधि का उपयोग कर सकते हैं।
आहार, शरीर उपधि, पचखूं पाप अठार ।
मरण पाऊं तो वोसिरे, जीऊं तो आगार
यावज्जीवन संथारा
देह शक्ति क्षीण होते देखकर या आयुष्य निकट आया जानकर साधु, साध्वी या श्रावक, श्राविका की साक्षी से किया जाता है। पूर्वाभिमुख या आचार्य देव की दिशा में वन्दना करके यथा-शक्ति, तिविहार, चौविहार प्रत्याख्यान कर संथारा करना चाहिए।
अनशन पाठ
मैं अरिहन्त देव, गुरु एवं धर्म की साक्षी से यावज्जीवन तीन / चार आहार का त्याग करता हूँ। करती हूँ।
अनशन-काल में ध्यान देने योग्य बातेः
१. व्रतों में हुयी भूलों की सरल-भाव से आलोचना करना। २.चौरासी लाख जीवयोनि तथा जिनके साथ कटु व्यवहार हुआ हो उनसे व्यक्तिगत खमत खामणा करना। (खमाए बिना मरने वाला विराधक माना गया है)
३. देव, गुरु, धर्म रूप त्रिशरण को बार-बार दोहराना।
४. अतीत जन्मों में कृत पापों की आलोचना करना।
५. अन्तिम समय की घोर वेदना में भगवान महावीर, राजर्षि सनत्कुमार, स्कन्दक, गजसुकुमाल आदि संतों की सहनशीलता स्मरण करते हुए परिणामों को सुदृढ़ रखना।