(लय- भक्तामर)
① सुरतरू समान् शीतल शासन की ध्छाया ।
दृढ़ ध्यान योगी तारक पावस है पाया ।।
इकमास मौन धारी एकान्त वासी ।
शासन के गौरव का गौरव आज गाया।
② श्रमशील संत् सुमतिका मार्गदर्शन
देवारय श्रमण देते मार्मिक संभाषण
आदित्यमुनि ने जनमानस को लुभाया
श्रावक समाज सीखा पल-2 प्रबन्धन
③ थी ज्ञान संवर्धनी प्रतियोगिताएं
भिक्षु विचारदर्शन सबको लुभाए
. तुलसी विचारदर्शन श्रुत को बढ़ाए
④ इतिहास है बनाया तप त्याग का निराला
जपध्यान मौन पौषध या नित्यमाला
बनकर उपासक करे. हम संघ सेवा
गुण संपदा बढ़ाऐ छाए उजाला
④ बीता है आज पावस देते विदाई
शासन को शान तमने शिखरों चढाई
कृतज्ञ आज है परिकर ज्ञानशाल
हो पुनः पावस यहां यह आस लाई