गुरु वन्दना
युग प्रणेता, युग प्रचेता, युग पुरुष लो वन्दना
विनयनत बद्धांजलि हम, कर रहे अभिवंदना ।
धन्य है सौभाग्य तुम से, कुशल अनुशास्ता मिले
दिव्य जीवन पा तुम्हीं से, भव्य शतदल हैं खिले ।
तपो युग-युग धर्म शासक, जयविजय पग-पग वरो । तुम्हीं नैया के खेवैया, पार भव जल से करो ॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात् परं ब्रह्म, तस्मै सद्गुरवे नमः॥
(गुरु ब्रह्मा है, विष्णु है, देव है, शिव है। गुरु साक्षात् परम ब्रह्म है, ऐसे सद्गुरु को मेरा नमस्कार)
गुरु उपासना
गुरु की करुणा से मिलता संयम सुखमय,
गुरु के चरणों में रहता साधक निर्भय ।
गुरु की सन्निधि में दुविधा मिटती सारी,
गुरु का पथ-दर्शन पग-पग मंगलकारी ॥
गुरु के अनमोल बोल संजीवन देते,
तूफानों में भी जीवन नौका खेते ।
गुरु अत्राणों का त्राण विश्व-वत्सल है,
मिलता जिससे पल-पल नूतन संबल है ।
हर कठिन समस्या का हल गुरु की आस्था,
दिग्भ्रान्त मनुज को मिल जाता है रास्ता ।
गुरुदेव द्वीप है शरण प्रतिष्ठा गति है,
गुरु-दृष्टि जगत् में सबसे बड़ी प्रगति है ॥
लय : लावणी
रचयिता : आचार्यश्री तुलसी
ॐ अर्हम्
ॐ अर्हम्, सुगुरु शरणं, विघ्न-हरणं, मिटे मरणं,
सहज हो मन, जगे चेतन, करें दर्शन, स्वयं के हम ।
बनें अर्हम्, बनें अर्हम्, बनें अभी बनें अर्हम् ॥