Namskar Mahamantra

नमस्कार महामंत्र 

णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो 
आयरियाणं णमो उवज्झायाणं
 णमो लोए सव्वसाहूणं ।
नमन हमारा अरहंतों को, सिद्धों को आचार्यों को । आगम पुरुष उपाध्यायों को और लोक के सब संतों को ।।
एसो पंच णमुक्कारो, सव्व पावपणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ॥ 
नमस्कार पंचक यह पावन, करता सब पापों का नाश । सभी मंगलों में प्रधान है, प्रकटे भीतर दिव्य प्रकाश ।।
मंगल स्तोत्र
ऋषभ-अजित-संभव अभिनन्दन, सुमति-पद्मप्रभु-त्राता । श्री सुपार्श्व-चन्द्रप्रभु सुविधिः शीतल-जिन सुखदाता । श्रेयाँस-वासुपूज्य-ज्ञाता, 
विमल-अनन्त-धर्म-शांति जिन ॥ कुन्थु अर हितकारी, मल्लि-मुनिसुव्रत-नमि, नेमी । पार्श्व – वीर – जयकारी, जाऊं इनकी बलिहारी ॥२. 
अरहंन्तो भगवन्त इन्द्र-महिताः सिद्धाश्च सिद्धि-स्थिताः । आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः, पूज्या उपाध्यायकाः । मुनिवरा,
श्रीसिद्धान्त-सुपाठका रत्न-त्रयाराधकाः । 
पंचचैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मंगलम् ॥ 
इन्द्रों द्वारा पूजित अरिहन्त भगवान, सिद्धि लोक
में बसने वाले सिद्ध भगवान, जिनशासन की उन्नति करने वाले आचार्य, आगमों को भली-भांति पढ़ाने वाले पूजनीय उपाध्याय और ज्ञान-दर्शन-चारित्रात्मक रत्नत्रय के आराधक मुनिवर- यह पंच-परमेष्ठी प्रतिदिन हम लोगों का मंगल करे।
ब्राह्मी चन्दनबालिका, भगवती राजीमती, द्रौपदी कौशल्या च मृगावती च सुलसा, सीता सुभद्रा शिवा कुन्ती शीलवती नलस्य दयिता, चूला प्रभावत्यपि पद्मावत्यपि सुन्दरी, प्रतिदिनं कुर्वन्तु नो मंगलम् ॥
ब्राह्मी, चन्दनबाला, भगवती राजीमती, द्रौपदी, कौशल्या, मृगावती, सुलसा, सीता, सुभद्रा, शिवा, कुन्ती, नलदयिता शीलवती दमयन्ती, पुष्प चूला, प्रभावती, पद्मावती और सुन्दरी ये सोलह महासतियां प्रतिदिन हम लोगों का मंगल करे।मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गी मंगलं स्थूलिभद्राद्याः, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥
बीर भगवान मंगल है, गौतम स्वामी मंगल
हैं। स्थूलि-भद्रादि बहुश्रुतधर मंगल हैं और जैन-धर्म मंगल है।
सर्व – मंगल – मांगल्यं, सर्व – कल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयतु शासनम् ॥
जो सर्व मंगलों में मंगल है, जो सभी कल्याणों का हेतु है, जो सब धर्मों में प्रधान है, वह जैन-शासन जय को प्राप्त हो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग् भवेत् ॥ सब लोग सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी जन कल्याण के पथ की अपेक्षा करें, कोई प्राणी दुःखी न हो।
नमिऊण असुरसुर-गरुल-भुयंगपरिवंदिए गयकिलेसे। अरिहे सिद्धारिए उवज्झाए सव्वसाहू य ॥
और वंदनीय तथा सभी क्लेशों असुर, सुर, भवनपति तथा नागकुमार से पूजनीय लेशों से रहित अर्हत, नमन करता हूं, वंदना करता हूं। सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सब साधुओं को मैंमंगल किरण
धम्मो मंगल-मुक्किट्ठ, अहिंसा संजमो तवो ।
देवा वि तं नर्मसंति, जस्स धम्मे सया मणो ॥ धर्म उत्कृष्ट मंगल है। अहिंसा, संयम और तप उसके लक्षण हैं। जिसका मन सदा धर्म में रमा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
चइत्ता भारहं वासं, चक्कवट्टी महिडिओ । संती संतिकरे लोए, पत्तो गइमणुत्तरं ॥ महर्द्धिक और लोक में शान्ति करने वाले शान्तिनाथ चक्रवती ने भारतवर्ष को छोड़कर अनुत्तर गति प्राप्त की।
देव-दाणव-गंधव्वा, जक्ख-रक्खसकिन्नरा ।
बंभयारिं नमंसंति, दुक्करं जे करंति तं ॥ उस ब्रह्मचारी को देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नर – ये सभी नमस्कार करते हैं, जो दुष्कर ब्रह्मचर्य का पालन करता है।
मंगलं मतिमान् भिक्षुः, मंगलं भारमल्लकः, मंगलं रायचन्द्राद्याः, मंगलं तुलसी गुरुः । महाप्रज्ञोऽस्तु मंगलं, तेरापन्थोऽस्तु मंगलम् ॥
मतिमान् आचार्य भिक्षु मंगल हैं। आचार्य भारमल्ल मंगल हैं। आचार्य रायचन्द्र आदि मंगल हैं। आचार्य तुलसी गुरु मंगल हैं। आचा महाप्रज्ञ मंगल हैं। तेरापंथ धर्मसंघ मंगल है।

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