(लय- प्रभो तुम्हारे पावन पथ पर)
महा मनस्वी महायशस्वी तेजस्वी गण वनमाली -2
महा तपस्वी महाश्रमण से संघ बना है गौरवशाली
श्रुत की पावन गंगा बहती विविध रूप धर प्रवचन मे-2 गहरीआस्था जिनवांग्मय में और भिक्षु के चिन्तन में आ अनुभव के उज़ले दिवलो से -2 हर मौसम में है दीवाली
2 गायन का अंदाज़ निराला सबके मानस को भाये-2 सुन अनुगूंज सुरो की लगता तुलसी धरती पर आये कल्याणी वाणी गुरुवरकी -२ जैसे शांत सुधारस प्याली महा मनस्बी महायशस्वी
3 नये क्रान्ति के हस्ताक्षर तुम, नये विश्वका स्रिजन करो
अनुकंपा की जगा चेतना मानव मन की पीर, हरो
भाई चारे के भावो से उतरे घर-2 में खुशियाली
4. निष्ठा पंचामृत प्रसाद दे तुमने हमको धन्य किया
कल्पतरु बनकर जन-2को तुमने हर अवदान अनन्य दिया
करते रहो आर्य युग-2 तक इस नन्दन वन की रखवाली महातपस्वी महाश्रमण से संघ बना है गौरवशाली