5
सुमति प्रभु स्तवन (लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहे)
सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता।
1. सुमति जिनेश्वर साहिब शोभता, सुमति करण संमार सुमति जप्यां थी सुमति बधे घणी, सुमति सुमतिदातार ॥
2. ध्यान सुधारस निरमल ध्याय ने पाम्या केवल नाज। बाण सरस वर जन बह तारिया, तिमिर हरण जगभाण ॥
3. फटिक-सिंहासण जिनजी फाबता, तरु अशोक उदार। छत्र चमर भामंडल भलकतो, सुर-दुन्दुभि झिणकार ॥
4. पुष्प-वृष्टि दिव्य-ध्वनि दीपती, साहिब जग सिणगार। अनंत ज्ञान दर्शन बल चरण ही, द्वादश गुण श्रीकार ॥
5. वाण अमी सम उपशम-रस भरी, दुर्गति-मूल कषाय। शिव-सुख नां अरि शब्दादिक कह्या, जग-तारक जिनराय॥
6. अंतरयामी ! शरणै आपरै, हूँ आयो अवधार। जाप तुमारो निश-दिन संमरूं, शरणागत सुखकार॥
7. संवत उगणीसै सुदि पख भाद्रवै, बारस मंगलवार। सुमति जिनेश्वर तन मन स्यूं रट्या, आनंद उपनो अपार॥
लय : मूरख जीवड़ा रे गाफल मत रहे