Bhikshu Ashtkam (Aachary Mahapragya Ji)

भिक्षु अष्टकम्
(आचार्य महाप्रज्ञ)
१. अकम्पः संकल्पः क्वचिदपि न केनापि चलितः, 
न चित्ते चांचल्यं न च विपथगामीन्द्रियगणः।
 समं सोढा गालिः क्वचन घनमुष्टेः प्रहरणं, 
प्रसन्ना त्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
तेरापंथ के आद्यप्रणेता आचार्य भिक्षु दृढ संकल्प के धनी थे। कोई भी व्यक्ति उनके संकल्प को किसी भी परिस्थिति में प्रकम्पित नहीं कर सका। उनके चित्त में न किसी प्रकार की चंचलता ही थी और न इन्द्रियों की उत्पथगामिता। कहीं उनको गालियां मिलीं तो कहीं सघन मुष्टि का प्रहार। दोनों को उन्होंने समभावपूर्वक सहन किया। वे निर्मल चेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें- बस जायें।
२. न रागो रागो न द्वेषो घटितघटनासु प्रतिकृतः,
 विरोधः सद्भावे परिणतिमुपागात् प्रतिपदम् । 
न लेशः क्लेशानां समजनि निमेषं सहचरः,
 प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
उनके मन में घटित घटनाओं की प्रतिक्रिया से होने वाला न राग था और न द्वेष। इसलिए पग-पग पर होने वाला विरोध सहज ही सद्भाव में परिणत हो गया। उनको पलभर के लिये भी लेशमात्र क्लेश नहीं हुआ। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें बस जायें।
३ . अलब्धेऽप्याहारे सुमतिरचलन्नो क्षणमपि,
न लब्धं सुस्थानं तदपि पथि नीते स्थिरमतिः । 
न कष्टं तत्कष्टं भवति यदि चित् स्पष्टमुदिता,
 प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
वर्षों तक उन्हें पूरा आहार-पानी नहीं मिला, फिर भी उनका धैर्य क्षणभर के लिए भी विचलित नहीं हुआ। वर्षों तक उन्हें रहने योग्य स्थान नहीं मिला, फिर भी उनकी सुस्थिर मति स्वीकृत पथ का अनुगमन करती रही, उस पर निश्चल रही। (उन्हें कभी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ।) यह सत्य है कि चेतना का स्पष्ट जागरण हो जाने पर कष्ट कष्ट नहीं लगता। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें बस जायें।
४. सदा स्वच्छो भावो जिनवचनभावैरपमलः, 
कृतादर्शा प्रज्ञा मतिविभवमाक्रम्य सुगता । 
न चेर्ष्या नो निंदा गहनतमनिष्ठा स्वचरिते, 
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
उनकी निर्मल भावधारा जिनवचनों से अनुप्राणित होकर सदा निर्मल बनी रही। बुद्धि-वैभव का अतिक्रमण कर आदर्श से फलित होने वाली प्रज्ञा को उन्होंने प्राप्त किया। उनमें अपने चरित्र के प्रति गहरी निष्ठा थी, इसलिए उनके मन में किसी के प्रति न ईर्ष्या का भाव था और न निन्दा का भाव। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें बस जायें।११२. मंगल किरण
५. न सा काम्या बुद्धिर्भवति खलु या बंधनिरता.
 प्रशस्यां तां मन्ये भवति च यतश्चिद विकसिता । स्वचैतन्ये निष्ठा प्रशमसुखवृष्टेरनुभवः, 
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
आचार्य भिक्ष ने कहा- मैं उस बुद्धि को अच्छा मानता हैं, जिससे चैतन्य का विकास हो सके। वह बुद्धि मेरे लिये ग्राह्य नहीं है, जो कर्मबंधन में निरत हो। इस प्रकार उनके मन में अपने चैतन्य के प्रति निष्ठा और समता-सुख की वृष्टि करने वाला अनुभव था। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें – बस जायें।
६. ज्वरो यस्याध्वानं सततमविगानं विहितवान्, 
निराशा संन्यस्ता सरिति रवितापेन सुतराम् । 
प्रकाशः संप्राप्तो गहनतिमिरे चैत्यनिलये, 
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
राजनगर में आचार्य भिक्षु को ज्वर का प्रकोप हुआ, जिसने उनके मार्ग को सदा के लिये प्रशस्त बना डाला। सिरियारी की नदी की तप्त बालुका में उन्होंने आतापना ली, जिससे उनकी निराशा सतत मिटती चली गई। उनको केलवा के मन्दिर की ‘अन्धेरी ओरी’ के सघन अंधकार में प्रकाश मिला। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें बस जायें।
७. अगम्यं यन्नाम प्रबलतपसा संचितयशो, 
न शेषाः संक्लेशा विलयमुपयान्ति स्मरणतः ।
नयन्ॐ ऐं ॐ ॐ अमलमनसाईं सवलयं,
 प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
आचार्य भिक्षु का पुण्य नाम अगम्य है। उन्होंने घोर तपस्या की। उनका नाम यशस्वी बन गया। जो व्यक्ति पवित्र मन से ‘अर्हम्’ का वलय बनाता हुआ ‘ॐ ऐं ॐ भिक्षु’-इस नाममंत्र का जप करता है, उसके समस्त संक्लेश विलीन हो जाते हैं। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें- बस जायें।
८. मतिः सिद्धा शुद्धा भवतु प्रतिबुद्धा प्रतिपलं, 
मनो हित्वा भ्रान्तिं व्रजतु सुखदां शांतिममलाम् । 
सदा ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं स्फुरतु नितरां भावनिचये,
 प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे ॥
उनकी अनुकम्पा से मेरी मति सिद्ध, शुद्ध और प्रतिबुद्ध हो, मेरा मन भ्रान्ति को छोड़कर सुखप्रद और विमलशांति को प्राप्त करे, मेरी भावधारा में सदा ‘ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं’ का मंत्र (ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं भिक्षु) स्फुरित हो। वे निर्मलचेता भिक्षु स्वामी मेरे नयनों में अवतरित हो जायें बस जायें।
(अनुवादकः मुनि राजेन्द्र)

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