महाप्रज्ञ-अष्टकम् (युवाचार्य महाश्रमण)
१. पुनीतान्तः प्रज्ञा गहनतम तत्त्वेषु निपुणा, श्रुतस्वाध्यायेन सुविदितरहस्यो विभुवरः ।
प्रशस्या शास्त्राणां सुषमतर-सम्पादन-सृतिः,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ॥
आपकी पुनीत अन्तःप्रज्ञा गहनतम तत्त्वों को जानने में निपुण है। आपने आगमों के स्वाध्याय से उनके रहस्यों को भलीभांति आत्मसात् कर लिया है। आपके द्वारा विहित आगमों के सुसम्पादन का कार्य प्रशस्य है- श्लाघ्य है ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
२. विशुद्धा सम्भाषा विनयति विबाधाः प्रतिपदं,
प्रकाण्डं पाण्डित्यं श्रवति मुखपद्मात् प्रवचने ।
प्रभावी व्याहारो जनयति समाधिं जनचये,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ॥
आपका पवित्र संभाषण (वार्तालाप) पग-पग पर बाधाओं का अपनयन करता है। प्रवचन में आपका प्रकाण्ड पांडित्य मुखरूपी कमल से (मकरन्द की भांति) झरता है। आपकी प्रभावशाली वाणी जनसमूह में समाधि (शांति) उत्पन्न करती है, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
३. गभीरं साहित्यं सुमतिविद्यां प्रीतिजनकं,
प्रदत्ते सौहित्यं पठनपर-लोकाय विपुलम् । विशिष्टश्लोकानां विरचनमकार्याशुकविना,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः।।
आपका गंभीर साहित्य बुद्धिमान् और विद्वान् लोगों के लिये आह्लाद-जनक है तथा पठनशील व्यक्तियों को विपुल तृप्ति देता है आपने आशुकविता के माध्यम से विशिष्ट छन्दों में विशेष श्लोकों की रचना की है, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
४. तनावग्रस्तोऽयं विविधभययुक्तश्च मनुजः,
विधत्ते सन्तापं प्रशमसमभावाद् विरहितः ।
शुभं प्रेक्षाध्यानं सहजसुखदं विश्ववरदं,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ।।
आज का यह मनुष्य तनावग्रस्त और विभिन्न प्रकार के भयों से युक्त है। वह शांति और समता के अभाव में सन्ताप का अनुभव कर रहा है। ऐसी स्थिति में सहज सुख देने वाली तथा विश्व के लिये वरदान स्वरूप प्रेक्षाध्यान की प्रशस्त पद्धति आपके द्वारा प्रणीत है, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।१२०. मंगल किरण
५. विकासो बुद्धेः स्याद् विशदतरभावेन सहितः,
पवित्रा लेश्या चेत् प्रखरमतिलाभोऽपि सुफलः ।
शिवा शिक्षाक्षेत्रे बुधनरमता जीवनकला,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ॥
यदि विशदभावों के साथ बुद्धि का विकास होता है तथा लेश्या (भावधारा) पवित्र होती है तो बुद्धि की प्रखरता भी सुफलदायी होती है। इसी विचारधारा से शिक्षा के क्षेत्र में कल्याणकारी तथा विद्वज्जनों-शिक्षाविदों द्वारा सम्मत जीवन-विज्ञान (जीने की कला) का आयाम आपके द्वारा प्रवर्तित हुआ, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
६. अहिंसा-शक्तीनां भवतु समवायः सुखकरः,
सदा यात्रा भूयात् विविधजनताया हितकृते ।
जगत्यां तेजस्ते प्रहरतुतमां व्याप्त-तिमिरं,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ॥
आप द्वारा समायोजित ‘अहिंसा समवाय’ अहिंसक शक्तियों का सुखकर समवाय हो। आपकी यात्रा सदा विविध जनसमूह के हित के लिये हो। आपकी तेजस्विता जगत् में व्याप्त अन्धकार – बुराइयों पर प्रहार करने वाली – विनष्ट करने वाली हो, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
७. दयाभावः पुण्यो विलसतितरां पूतहृदये,
प्रकामं वात्सल्यं प्रवहति सुधातुल्यममलम् ।
प्रसन्ना मुद्रेयं स्फुरति वदने शान्ति-जननी,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ।।
आपका पवित्र हृदय निर्मल करुणाभाव से परिपूर्ण
है। आपके नेत्रों से अमृत के समान स्वच्छ अत्यधिक वात्सल्य प्रवाहित होता है। आपके मुख पर स्फुरित होनें वाली यह प्रसन्नमुद्रा शान्ति उत्पन्न करने वाली है, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
८. शरच्चन्द्रश्वेतोगणगगनभानुर्गतमलः,
सुलब्धा प्रख्यातिः प्रणयन-कलायां कविकुले ।
प्रदत्तं विज्ञेभ्यः कठिनतरपृच्छा-प्रतिवचः,
महाप्रज्ञः पूज्यो जिनपतिसरूपो गुरुवरः ॥
आप शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान धवल हैं, गण-आकाश में चमकते हुए सूर्य हैं। आपने साहित्य-निर्माण कला में विद्वत्समूह में विशिष्ट ख्याति अर्जित की है। आपने विज्ञजनों के जटिल प्रश्नों के उत्तर सहज और सरलता से दिये हैं, ऐसे पूज्य गुरुवर महाप्रज्ञ तीर्थंकर के तुल्य हैं।
(अनुवादकः मुनि राजेन्द्र)