Shrawak Sambodh

श्रावक-संबोध

(पूर्व भाग)
समर्पण
1. अणुव्रत-त्रिपथगांप्रेक्षा-प्रद्योतनात्मजाम् ।
जीवनविज्ञान-ब्रह्पुत्रीं तरंगिणीत्रयम् ॥
2. स्मृत्वा स्नात्वा च विस्तार्य,बोधत्रयं वितीर्य च।
अथ श्रावकसंबोधः,श्रीसंघाय समर्प्यते ॥ (युग्मम्)
धर्म का काम है मनुष्य को मनुष्यता का बोधपाठ देना, अच्छा जीवन जीने की कला सिखाना। अणुव्रत मानवीय मूल्यों की न्यूनतम आचार-संहिता है। इससे जीवन पवित्र बनता है। इस दृष्टि से अणुव्रत को त्रिपथगा-गंगा से उपमित किया गया।
धर्म का आचरण करने से मनुष्य का जीवन बदलता है। प्रेक्षाध्यान जीवन में बदलाव लाने का अनुभूत प्रयोग है। मैं उसको प्रद्योतनात्मजा-सूर्यपुत्री यमुना के रूप में देखता हूं।
शिक्षा को मूल्यपरक और प्रायोगिक बनाने से विद्यार्थी के सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास संभव है। जीवनविज्ञान का कार्यक्रम इसी उद्देश्य से चल रहा है। ब्रह्मपुत्री-सरस्वती विद्या की प्रतीक है। इसलिए जीवनविज्ञान की तुलना उससे की गई है।
मैंने अणुव्रत गंगा, प्रेक्षा यमुना और जीवनविज्ञान सरस्वती-इस त्रिवेणी का स्मरण, अवगाहन और विस्तार किया। तीन बोध-आचार-बोध, संस्कार-बोध और व्यवहार बोध की रचना की। अब श्रावक समाज के लिए श्रावक-संबोध का निर्माण किया है। इसे में श्रीसंघ को समर्पित कर रहा हूं।
श्रावकधर्म की पृष्ठभूमि
(रामायण)
1. महातपस्वी महावीर की, जीवन-गाथा कालजयी। अटिठय गाम यक्ष-मंदिर में, बने आत्मबल से विजयी ॥
2. शूलपाणि ने किए उपद्रव, तंद्रा की-सी स्थिति आई। महास्वप्न दस देखे प्रभु ने, सबने सार्थकता पाई॥ (युग्मम्)
भगवान महावीर महातपस्वी थे। उनके जीवन की कहानी काल को जीतने वाली है, हर समय जीवंत रहने वाली है। साधना के प्रथम वर्ष में उन्होंने अस्थिक ग्राम में प्रवास किया। वहां एक यक्ष का मंदिर था। मंदिर के एक कोने में वे ध्यानप्रतिमा में स्थित हो गए। वहां शूलपाणि नाम का यक्ष रहता था। उसने ध्यानस्थ महावीर को देखकर अनेक प्रकार के उपद्रव किए। महावीर का मनोबल प्रबल था। वे विचलित नहीं हुए। आखिर यक्ष ने हार मान ली। महावीर अपने आत्मबल से विजयी हो गए।
महावीर इतने आत्मलीन थे कि उपद्रवकाल में उन्हें थोड़ी नींद-सी आ गई। उस तंद्रावस्था में उन्होंने दस महास्वप्न देखे। उनके सब सपने साकार हो 
3. उनमें चौथा महास्वप्न, -दो मालाओं का दर्शन था।
जो विशिष्ट अनगार अगार धर्म का सही निदर्शन था॥
4. स्वप्न-प्रवक्ता उत्पल-नहीं समझ पाया उसकी भाषा।
जिज्ञासा पर कर करुणा दी स्वयं वीर ने परिभाषा ॥
दस महास्वप्नों में चौथा स्वप्न था दो रत्नमालाओं का दर्शन। यह स्वप्न भगवान महावीर द्वारा विशेष रूप से निरूपित किए जाने वाले अनगार अगार (गृहस्थ धर्म) का सम्यक निर्देश था
भगवान पार्श्व की परंपरा का अनुगामी उत्पल महावीर के स्वप्नों का प्रवक्ता बना। वह चौथे स्वप्न का अर्थ नहीं समझ सका। उसने कहा-‘भंते! आपके चौथे स्वप्न का अर्थ समझ में नहीं आया। कृपा कर आप उसका अर्थ समझाएं।’ उत्पल की जिज्ञासा पर महावीर ने करुणा कर उस स्वप्न का अर्थ समझाया।
5. जो अगार-घर छोड़ बने, अनगार धर्म के अधिकारी।
शेष अगारी-घरबारी-के लिए अगार धर्म भारी ॥
धर्म के दो रूप हैं-अगार धर्म और अनगार धर्म। अगार का अर्थ है घर। घर का त्याग करने वाले अनगार धर्म के अधिकारी बनते हैं। शेष अगारी-गृहस्थ घरबारी होते हैं। उनके लिए अगार धर्म की व्यवस्था है।गृहस्थ धर्म का मार्ग खुला रहता है।
6. रहे भक्ति में शक्ति-संतुलन, महा-अणुव्रत का आधार।
जिनशासन की यह व्यापकता, युनिवर्सल श्री वीर-विचार ॥
शक्ति के अनुसार भक्ति’- यह एक कहावत है। भक्ति में  संतुलन बिठाने के लिए महाव्रत (अनगार धर्म) और अणुव्रत (अगार धरम  को आधार बनाया जा सकता है। महाव्रत और अणुव्रत का व जिनशासन की व्यापकता और भगवान महावीर के सार्वभौम वि प्रतीक है।प्रयास करें, यह आवश्यक है।
(लावणी)
7. जो हो संभव अनगार-धर्म का पालन, 
तो करें उसी पथ में अपना संचालन । 
क्षमता यदि अल्प, अनल्प धर्म में आस्था, 
साभार अगार-धर्म का पकड़ें रास्ता ॥
जिनके लिए अनगार धर्म का पालन संभव हो, उन्हें उसी पथ पर चलना चाहिए। धर्म में बहुत अधिक आस्था होने पर भी आचरण की शक्ति कम हो तो भगवान महावीर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए अगार धर्म को स्वीकार करना चाहिए।
8. यह व्रताऽव्रती धर्माऽधर्मी की श्रेणी, 
आध्यात्मिक आरोहण हित है निःश्रेणी। 
इस श्रेणी में जो भी मानव आते हैं,
 वे श्रमणोपासक, श्रावक कहलाते हैं।
अगार धर्म का पालन मध्यम श्रेणी की साधना है। यह व्रताऽव्रती धर्मी की श्रेणी है। इसे आध्यात्मिक विकास के लिए निसैनी माना न श्रेणी में आने वाले व्यक्ति श्रमणोपासक और श्रावक कहलाते है
9. श्रावक हैं श्रद्धाशील विमल विश्वासी, 
श्रावक जीवन-जागरणा के अभ्यासी। 
श्रावक ने अपना सही लक्ष्य पहचाना, 
मानवता का प्रतिमान स्वयं को माना ॥
श्रावक के जीवन में तीन विशेषताएं होती हैं-
वे देव, गुरु और धर्म के प्रति श्रद्धाशील होते हैं।
वे सबके विश्वासपात्र होते हैं।
वे जीवन की जागृति के लिए साधना का प्रयोग करने वाले होते हैं।
जो अपने लक्ष्य को पहचान लेते हैं और स्वयं को मानवता का प्रतिरूप मानते हैं, वे ही श्रावक कहलाने के अधिकारी हैं।
10. जिनशासन के अविभाज्य अंग हैं श्रावक, 
मति से, गति से जिनमत के सदा प्रभावक । 
शासन की उन्नति में निज उन्नति देखें, 
निज उन्नति में शासन-उन्नति आलेखें ॥
साधु की तरह श्रावक भी जिनशासन के अभिन्न अंग होते हैं। वे ज्ञान और आचरण से हमेशा जिनशासन की प्रभावना करने के लिए रहते हैं। वे जिनशासन के विकास में अपना विकास देखते हैं और विकास का अंकन शासन-विकास के रूप में करते हैं।
श्रमणोपासना के लाभ
(दोहा)
11. श्रमणों की समुपासना, श्रमणोपासक नाम । 
शास्त्रों का श्रोता सजग, श्रावक नाम ललाम ॥
12. फल उपासना का श्रवण, मिले श्रवण से ज्ञान।
 फिर विज्ञान विवेचना, उससे प्रत्याख्यान ॥
13. संयम प्रत्याख्यान से, हो आश्रव-अवरोध ।
 तप वोदाणे-निर्जरा, उससे अंतः शोध॥
14. ततः अतुल एकाग्रता अक्रिय बने अयोग।
 शाश्वत सिद्धि, उपासना से दस बोल अमोघ ॥
(विशेषकम्)
श्रावक श्रमणों की उपासना करता है, इसलिए श्रमणोपासक कहलाता बह शास्त्रों को जागरूकता से सुनता है, इसलिए श्रावक कहलाता है।
नों नाम सार्थक हैं।
1. श्रमणों की उपासना का फल है श्रवण ।
2. श्रवण का फल है ज्ञान।
3. ज्ञान का फल है विज्ञान।
4. विज्ञान का फल है प्रत्याख्यान।
5. प्रत्याख्यान का फल है संयम।
6. संयम का फल है अनाश्रव।
7. अनाश्रव का फल है तप।
8. तप का फल है व्यवदान-कर्मों का विच्छेद, निर्जरा।
9. व्यवदान का फल है अक्रिया।
(वंदना आनन्द)
15. तुंगिया नगरी निवासी श्रावकों की संकथा,
 ‘भगवती’ की वाचना से मिटे मानस की व्यथा।
 गहन जिज्ञासा भरे वर प्रश्न श्री गौतम करे, 
समाधान प्रधान श्री भगवान-वचनामृत झरे ॥
तुंगियानगरी में एक बार भगवान पार्श्वनाथ की परंपरा के स्थविर आए। वहां के तत्त्वज्ञ श्रावक उनका प्रवचन सुनने गए। प्रवचन सुन उन्होंने वीर के साथ धर्म-चर्चा की। वह प्रसंग भगवती सूत्र (श. 2/92-1) में वर्णित है। उसके अध्ययन से मन को संतोष मिलता है। गणधर नम ने भगवान महावीर से उसी विषय की विशद जानकारी पाने के लिए और जिज्ञासा भरे कुछ प्रश्न पूछे। उन प्रश्नों को प्रमुख रूप से समाहित ने के लिए भगवान ने वचनामृत की वर्षा की।
(रामायण)
16. सम्यगदर्शनज्ञानचरित्राणि रत्नत्रयी मोक्षपथ है।
उमास्वाति के शब्दों में, श्रावक-जीवन का यह अथ है
 सम्यगज्ञान और सम्यगचारित्र-ये तीन रत्न हैं। आचार्य उमास्वाति के शब्दों में यह रत्नत्रयी ही मोक्ष का मार्ग है। श्रावक जीवन प्रारंभ यहीं से होता है।

17. दर्शन-सप्तक औरअप्रत्याख्यानावरण विलय पाए।
तब संयम-व्रत में प्रवेश कर,देशव्रती वे कहलाएं ॥

(सहनाणी)
18. सम्यगदर्शन हो श्रावक में, त्रैकालिक आत्मा में आस्था।
आराध्यदेव अरहंत सदा, सद्‌गुरु आध्यात्मिक अनुशास्ता ॥
अर्हदभाषित सद्धर्म-अहिंसा संयम तप का आराधन ।हो लक्ष्य मोक्ष-परमात्मपदं, पुरुषार्थ स्वयं का संसाधन ॥
 सम्यगदर्शन के लक्षण
19. शम-हो कषाय का सहज शमन, संवेग-मुमुक्षा-वृत्ति सबल ।
निर्वेद-बढ़े भव से विराग, अनुकंपा-करुणा-भाव अमल ।
आस्तिक्य-कर्म आत्मादिक में, जन्मांतर में विश्वास प्रबल ।ये लक्षण सम्यगदर्शन के,जीवन-यात्रा में हैं सम्बल ॥
सम्यगदर्शन के पांच लक्षण हैं-शम-कषाय की उपशांति। संवेग-मुक्त होने की तीव्र भावना।
सम्यगदर्शन का महत्त्व
(मुक्त छंद)
20. बन जाए अज्ञान ज्ञान यदि सम्यगदर्शन, 
महावीर का मूल्यवान यह जीवन-दर्शन। 
आर्य भिक्षु का इसी दिशा में कदम बढ़ा है, 
ईसा ने जन्मांध व्यक्ति से पाठ पढ़ा है।
सम्यगदर्शन की उपलब्धि होने से अज्ञान ज्ञान बन जाता है और सम्यगदर्शन के अभाव में ज्ञान भी अज्ञान कहलाता है। यह भगवान महावीर का मूल्यवान जीवन-दर्शन है। इसी सिद्धांत को आधार मानकर आचार्य भिक्षु ने अपने चरण बढ़ाए। ईसामसीह को भी एक जन्मांध व्यक्ति से यह बोधपाठ मिला कि किसी अंधे व्यक्ति को आंख देना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है सम्यगदृष्टि (अंतर्दृष्टि) की उपलब्धि
(सहनाणी)
21. जो जैसा है वैसा देखे, सम्यगदर्शन की सहनाणी।
क्यों चले निषेधात्मक चिंतन ? हो सदा विधेयात्मक वाणी।
श्रावक जीवन की सार्थकता, नव तत्त्वों के अनुशीलन से।
खाते-पीते सोते-जगते, आवाज उठे अंतर्मन से ॥

नव तत्त्व : ज्ञान का आधार
(दोहा)

22.जानूं जीव’ अजीव’ मैं, पुण्य पाप’ की बात। 
आश्रव संवर निर्जरा’, बंध, मोक्ष’ विख्यात ॥

जीव, अजीव, पुण्य, पाप आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष नौ तत्त्व जैनदर्शन में प्रख्यात हैं। मैं इनको जानता हूं।
(रामायण)
23. जीव चेतनावान, चेतना-शून्य अजीव सदा जड़ है।
जड़-चेतन की शाश्वत सत्ता,जिनशासन अक्षय बड़ है।
जिसमें चेतना होती है, वह जीव है। जो चेतना से शून्य और जड़ है, वह अजीव है। जिनशासन में जड़ और चेतन दोनों के अस्तित्व को शाश्वत माना गया है।
लोकमत में अक्षय रहने वाले वटवृक्ष की चर्चा सुनी जाती है। वह विनष्ट भी होता है, पर जिनशासन वास्तव में एक अक्षय वटवृक्ष है।
वटवृक्ष है, यह निर्विवाद रूप में सत्य है।
24. पुण्य-पाप सुख-दुख के कारण, कृत करणी के ये परिणाम । 
उदयावली-प्रविष्ट शुभाशुभ-कर्म-वर्गणा के आयाम ॥
प्राणी सुख और दुःख का भोग करता है, उसके कारण हैं-पुण्य पाप। पुण्य-पाप और कुछ नहीं हैं, प्राणी द्वारा किए गए कर्मों के ही फल हैं। उन्हें उदयावस्था को प्राप्त शुभ-अशुभ कर्म पुद्गलों की गतिविधि माना जा सकता है।
में प्रवेश पा चुके हैं।
25. आश्रव-पुण्य-पाप-आकर्षक, स्पंदन रूप जीव-पर्याय। है
 निवृत्तिमय आत्म-परिणति, संवर शुद्ध चेतना आय ॥
पुण्य और पाप में हेतुभूत शुभ और अशुभ कर्मपुद्गलों को आकृष्ट करने वाले आत्मा के परिणामों का नाम आश्रव है। ये जीव के ऐसे प्रकंपन हैं, जो कर्मवर्गणा को अपनी ओर खींचते हैं।
आत्मा की निरोधमूलक वृत्ति का नाम संवर है। इससे विशुद्ध चेतना की उपलब्धि होती है।
26. बंधन का विच्छेद निर्जरा,है यह आंशिक उज्ज्वलता।
मंद-मंदतर तीव्र-तीव्रतर,तप का दीप रहे जलता ॥
बंधे हुए कर्मों का विच्छेद या उससे होने वाली आत्मा की आंशिक निर्मलता का नाम निर्जरा है। बारह प्रकार के तप निर्जरा के साधन है। निर्जरा के लिए आवश्यक है कि मंद या तेज तप का दीया जलता ही रहे।
नौ तत्त्वों में सातवां तत्त्व है निर्जरा। यह आत्मा और कमा के संबंध को तोड़ने की प्रक्रिया है, मुक्ति की प्रक्रिया है। जब तक बंधन, तब तक संसार। संसार से छुटकारा पाने के लिए बंधन का विच्छेद आवश्यक है। बंधन का विच्छेद होने से आत्मा की जो आंशिक उज्ज्वलता होती है, उसका नाम है निर्जरा। निर्जरा का साधन है तप। तपसा कर्मविच्छेदादात्मनैर्मल्यं निर्जरा-तपस्या के द्वारा कर्मों का विच्छेद होने से आत्मा की जो आंशिक निर्मलता होती है, उसे निर्जरा कहा जाता है। तप दो प्रकार का होता है-अंतरंग और बाह्य। निर्जरा के लिए यह आवश्यक है कि तप का दीया निरंतर जलता रहे। दीया मंद होगा तो निर्जरा हलकी होगी और दीया तेज होगा तो निर्जरा विशिष्ट होती रहेगी। आत्मसाक्षात्कार के लिए निर्जरा की अनिवार्यता है।
27. जीव-कर्म का अन्योन्याश्रय-जो संबंध, बंध संसार।द्वन्द्वहीन निर्बंध चेतना,मोक्ष सिद्धि अपवर्ग उदार ॥
जीव और कर्मवर्गणा के पुद्गलों का एक-दूसरे के साथ जो गहरा संबंध है, उसका नाम बंध है। यह बंध संसार-भ्रमण का कारण है, इस दृष्टि से इसी को संसारं माना गया है।
जीव और कर्म के द्वंद्व से मुक्त बंधनरहित चेतना का नाम मोक्ष है। इसे सिद्धि और अपवर्ग भी कहा जाता है।
(वंदना आनंद)
28.जीव और अजीव चौदह भेद आगम-भित्ति है,
 पुण्य के नव हेतु, द्विगुणित पाप दूषित वृत्ति है।
 पांच आश्रव, पांच संवर और बारह निर्जरा, 
बंध चार विमोक्ष चार विचार कर देखें जरा ॥
आगम के आधार पर नौ तत्त्वों के अनेक भेद-प्रभेद किए गए। वहां उनके 85 भेदों का उल्लेख है-
1. जीव 14 भेद  2. अजीव 14 भेद
3. पुण्य। 9 भेद   4. पाप 18 भेद
5. आश्रव 5भेद।  6. संवर 5 भेद
7. निर्जरा12 भेद 8. बंध  4 भेद
9. मोक्ष   4 भेद
पंचास्तिकाय : दर्शन का आधार
(दोहा)
29. अस्तिकाय हैं पांच ही, काल सहित षडद्रव्य । षडद्रव्यात्मक लोक है, शेष अलोक अलभ्य ॥

अस्तिकाय
पांचहैं-धर्मास्तिकाय,अधर्मास्तिकाय,
आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और जीवास्तिकाय। इन्हें द्रव्य कहा
(सहनाणी)
30. गति में साधक धर्मास्तिकाय,है अधर्मास्ति स्थिति-सहयोगी।
अवकाशद आकाशास्तिकाय जड़-चेतन सबके उपयोगी।
वह पुद्गलास्ति जो दृश्य जगत,चेतनायुक्त जीवास्तिकाय ।

समझें तत्त्वज्ञ सुधी श्रावक,गहराई से पंचास्तिकाय ॥
जीव और पुद्गल की गति में सहयोग करने वाला द्रव्य धर्मास्तिकाय है।
जीव और पुद्गल की स्थिति में सहयोग करने वाला द्रव्य अधर्मास्तिकाय है।
जीव और पुद्गल को अवकाश-स्थान देने वाला द्रव्य
चेतना है, वह जीव है।
31. अस्तिकाय-अस्तित्व-विवेचक, सूत्र ‘भगवती’ में व्याख्यान ।
 श्री मदुक की हुई प्रशंसा, सुनें पढ़ें इतिहास महान ॥
अस्तिकाय के स्वरूप का विवेचन करने वाला वर्णन भगवती सूत्र (श. 18/134-143) में है। उस प्रसंग में भगवान महावीर ने श्रमणोपासक मद्दक की प्रशंसा की। वह इतिहास का एक विशेष प्रसंग है। उसे सुनें और पढ़ें।
उनके चरणों में श्रद्धा से प्रणत हो गया।
षड्जीवनिकाय : चारित्र का आधार
(दोहा)
32. पृथ्वी अप तेजस तथा, वायु वनस्पतिकाय।
 त्रस-जैनागम में विदित, ये षड्जीवनिकाय ॥
जैन आगमों में छह जीवनिकाय के ये नाम प्रसिद्ध हैं-पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय।
(वंदना आनंद)
33. न्यूनतम नव तत्त्वविद्या का सहज संज्ञान हो, 
और सम्यगदृष्टि सम्यगज्ञान का संधान हो।
बिना प्रत्याख्यान श्रावक-भूमि में कैसे बढ़े ?
बिना अक्षर-ज्ञान जीवन-ग्रंथ को कैसे पढ़े ?
(लावणी)
34. जो श्रद्धालु श्री वीर-चरण में आए, 
बारह व्रत धारण कर श्रावक कहलाए। 
उनका समग्र जीवन ही पथदर्शक है, 
ह सप्तमांग का वर्णन आकर्षक है।
भगवान महावीर समवसरण में देशना देते। वहां श्रद्धालु लोग प्रवचन सुनते। जिन लोगों के मन में उनके वचनों के प्रति श्रद्धा, और रुचि बढी, वे बारह व्रत स्वीकार कर व्रती श्रावक बन गए। उनका जीवन श्रावक समाज के लिए पथदर्शक है। उनके जीवन का वर्णन स अंगसूत्र ‘उवासगदसाओ’ में आकर्षक ढंग से उपलब्ध है।
अणुव्रत
35. हैं पांच अणुव्रत प्रथम अहिंसा वाणी, 
हंतव्य न इसमें निरपराध त्रस प्राणी। 
स्थावर की सीमा, व्रत व्यापक बन पाए, 
आतंकवाद का अंत स्वयं आ जाए॥
बारह व्रतों में प्रथम पांच व्रत अणुव्रत कहलाते हैं। इनमें पहला अणुव्रत अहिंसा है। इसके अनुसार कम-से-कम निरपराध त्रस-चलने-फिरने वाले प्राणियों का हनन नहीं होना चाहिए। श्रावक के लिए स्थावर जीवों की हिंसा से सर्वथा बच पाना कठिन है, पर उसकी सीमा की जा सकती है।
अहिंसा अणुव्रत को व्यापक बना दिया जाए तो आतंकवाद की समस्या का समाधान अपने आप हो सकता है, क्योंकि इस व्रत की स्वीकृति के फलस्वरूप निरपराध मनुष्यों की हत्या सहज रूप में प्रतिबंधित हो जाती है।
36. वध बंधन अंग-भंग अतिभार नहीं हो, 
विच्छेद वृत्ति का क्यों बेकार कहीं हो?
 क्यों रहे क्रूरता? करुणा कोमलता हो,
 श्रावक जीवन में मैत्री निर्मलता हो।
अहिंसा अणुव्रत के पांच अतिचार हैं-वध, बंधन, अंग-भंग, अतिभार लादना और आजीविका का विच्छेद करना। श्रावक के जीवन में क्रूरता को अवकाश ही नहीं मिलना चाहिए। वहां तो केवल करुणा, कोमलता, मैत्री और निर्मलता का विकास ही वांछनीय है।
37.क्या कभी अहिंसा सत्य बिना जी सकती ? 
सूई धागे के बिना वस्त्र सी सकती ? 
अतएव अहिंसक सत्यनिष्ठ होता है,
 विश्वस्त स्वस्थ निज पाप-पंक धोता है।
38. जो नैतिकता से शून्य, शून्य जीवन है,
 इसलिए अचौर्य अणुव्रत संजीवन है। 
आर्थिक अपराधीकरण स्वयं चोरी है, 
प्रामाणिकता श्रावक की स्थिर थ्योरी है।
जो जीवन नैतिकता से शून्य होता है, वह वास्तव में शून्य है। दृष्टि से अचौर्य अणुव्रत संजीवन है-शून्यता को भरने वाला है। आप घोटाले किसी भी क्षेत्र में हों, उनका समावेश चोरी में होता है। अणुव्रत के अनुसार प्रामाणिकता श्रावक जीवन का सुस्थिर सिद्धांत है
अनैतिकता की अंधी सुरंग में धकेलते हैं।
39. है ब्रह्मचर्य अपने से अपना रक्षण, 
भोगेच्छा-परिसीमन का सघन प्रशिक्षण। ‘
अपने घर में संतुष्ट’ नियम में निष्ठा,
 श्रावकजीवन की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा ॥
श्रावक का चौथा अणुव्रत है ब्रह्मचर्य। यह अपने द्वारा अपने जीवन की सुरक्षा है। भोग-लालसा को सीमित करने का सघन प्रशिक्षण इसी में निहित है। इस व्रत के प्रति निष्ठाशील श्रावक अपने घर में संतुष्ट रहते हैं-स्वदार संतोषी होते हैं। यह श्रावकजीवन की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा है
40. इच्छापरिमाण अणुव्रत अपरिग्रह का, 
हो जाता स्वयं शमन आर्थिक विग्रह का। 
आवश्यकता आकांक्षा एक नहीं है, 
आकांक्षा पर हो अंकुश, यही सही है।
इच्छाओं को सीमित करना पांचवां अपरिग्रह अणुव्रत है। इससे आर्थिक झंझट अपने-आप शांत हो जाते हैं। आवश्यकता और आकांक्षा एक नहीं है। आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है, किंतु आकांक्षा की पूर्ति असंभव है। अतः आकांक्षाओं पर अंकुश लगे, यही सिद्धांत सही है।
गुणव्रत
41. दिगव्रत में यातायात नियंत्रण होता,
 भोगोपभोग-नियमन संयम का सोता।
 परिहार अनर्थदंड का, टले प्रदूषण, 
ये तीन गुणव्रत श्रावक-जीवन-भूषण ॥
पांच अणुव्रत के बाद श्रावक के लिए तीन गुणव्रत बतलाए गए हैं-
दिगव्रत-गमन-आगमन के लिए क्षेत्र का सीमाकरण।
भोगोपभोग नियमन खाने-पीने, पहनने ओढ़ने आदि के काम आने वाली वस्तुओं का संयम।
अनर्थदंड परिहार-बिना प्रयोजन हिंसा, असत्य आदि असद् आचरण का परित्याग। अनर्थदंड का प्रयोग छूटने से प्रदूषण की समस्या भी समाप्त हो सकती है।
उक्त तीनों गुणव्रतों को श्रावक जीवन का आभूषण माना गया है।
(सोरठा)
42. उपभोक्ता अनपार, परिमित भोग्य पदार्थ हैं। सीमांकन संस्कार, समाधान श्रावक करें॥
इस संसार में उपभोक्ता-भोग करने वाले अनगिन हैं। भोग्य पदार्थ मित हैं। यह एक समस्या है। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत भोगोपभोग की बमा के संस्कार पुष्ट कर श्रावक इस समस्या का समाधान करें।
(वंदना आनंद)
43. गरीबी गौरव गमाना, अमीरी अभिशाप है, 
मांग खाना मान खोना मानसिक संताप है। 
भले कृषि वाणिज्य श्रम से अर्थ का अर्जन करें, लोकगर्हित क्रूर कर्मादान का वर्जन करें ॥
भोगोपभोग की सीमा करने वाले श्रावक सब कुछ छोड़ दें, अकिंचन – जाएं, यह अभीष्ट नहीं है, क्योंकि गरीबी से गौरव समाप्त होता है र अमीरी अभिशाप बन जाती है। गृहस्थ जीवन में मांगकर खाना बना स्वाभिमान खोना है। उससे मानसिक कष्ट बढ़ता है। ऐसी स्थिति में चक खेती, व्यापार या किसी भी प्रकार का श्रम करके अर्थ का अर्जन , यह लोकसम्मत है, किंतु लोक में घृणित और क्रूर माने जाने वाले नांदान-व्यापार का वर्जन अवश्य होना चाहिए
45. सामायिक पौषध की गतिविधि कैसी हो ?
 अंतः-समता साकार बने वैसी हो। 
मिश्री. मोहन. की मूर्ति सामने आए, 
तो मन आमोद-प्रमोद-भाव बढ़ जाए॥
श्रावक का नौवां व्रत है सामायिक। यह समता के प्रयोग है। दसवां देशावकाश व्रत सहज है और सबसे अधिक सरल है। म्याग पौषध व्रत है। प्रतिपूर्ण पौषध में एक दिन-रात के लिए चतुर्विध आर त्याग के साथ निर्बाध रूप में समता का अभ्यास किया जाता है। इस से संयम पुष्ट होता है।
सामायिक और पौषध की गतिविधि कैसी होनी चाहिए? इसा का सीधा-सा उत्तर है-अंतःकरण में समता का साक्षात अनुभव हो वैसी होनी चाहिए। इस प्रसंग में मिश्रीमलजी सुराना (राणावास) मोहनलालजी खटेड़ (लाडनूं) ये दो चेहरे सामने आते हैं तो मन प्रसन्नता और प्रमोद भावना की वृद्धि हो जाती है।
(दोहा)
46. श्रावक का व्रत आखिरी, संयम में सहयोग। संविभाग निज वस्तु का, परम पवित्र प्रयोग ॥

(वंदना आनंद)

47. मुनि अकिंचन पचन-पाचन की क्रिया से मुक्त हैं, भ्रामरी भिक्षाचरी उनके लिए उपयुक्त है।
 संविभागी धर्मरागी विसर्जन मुनि-हित करें,
 भावना की नाव से संसार सागर को तरें ॥
श्रावक का आखिरी-बारहवां व्रत है-अतिथि-संविभाग। संयमी व्यक्ति  के संयम में सहयोग देना इस व्रत का उद्देश्य है। इसमें श्रावक , पानी, वस्त्र आदि अपनी वस्तुओं का संविभाग कर साधु को मह एक परम पवित्र प्रयोग है।
मुनि अकिंचन होते हैं, उनके पास किंचित भी धन-वैभव नहीं हो पचन-पाचन की क्रिया से मुक्त होते हैं। वे न तो अपने लिए भोजन पकाते और न दूसरों से पकवाते हैं। आगमों में उनके लिए भ्रामरी भिक्षाचरी मुक्त बताया गया है। जिस प्रकार भंवरा फूलों से थोड़ा-सा रस लेता ही मुनि गृहस्थों के घर से सहज निष्पन्न भोजन आदि का थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करते हैं। इसे माधुकरी वृत्ति या गोचरी भी कहा जाता है।
गृहस्थ श्रावकधर्म के अनुरागी होते हैं और संविभाग के सिद्धांत में वास करते हैं। वे मुनियों के लिए अपनी वस्तु का विसर्जन करें और मुनी को दान देने की भावना रूप नौका से संसार-समुद्र को पार करें।
हर्बर्ट वारेन
(लावणी)
48. संयमी-दान की नित्य भावना भाएं, ‘हर्बर्ट वारेन’ की गतिविधि स्मृति में लाएं। आए मुनि देख खड़े हो सविनय वंदन, व्रत से जोड़ें, तोड़ें भव-भव के बंधन ॥
बारहवें व्रत के अनुसार श्रावक प्रतिदिन संयमी दान की भाव योग करे। इस प्रसंग में विदेशी विद्वान ‘हर्बर्ट वारेन’ की गतिविधि को वा जाए। भिक्षा के लिए आए हुए मुनि को देखते ही खड़े होकर कि साथ वंदना की जाए। उसके बाद उन्हें भोजन-पानी लेने की प्राथ यं को बारहवें व्रत से जोड़ें और जनम जनम के बंधनों का विच्छे
हर्बर्ट वारेन
(संलेखना/संथारा

(वंदना आनंद)

49. काम्य हो सब श्रावकों को आखिरी संलेखना,
 मृत्यु को भी सहज सुंदर साधना कर देखना। 
बिना अनशन के विमन-मन मौत कोई मौत है! 
जो कलात्मक-धर्मसम्मत, मौत सुख का स्रोत है।
50. प्रथम त्रिविधाहार का परिहार, फिर जल छोड़ दें
, देह के परिकर्म से, आसक्ति से मन मोड़ दें। 
जीविताशा-मरणभय से मुक्त पुलकित चेतना, 
आत्महित परहित बने वह अमर शांति निकेतना ॥कामभोगों की आशंसा-कामभोग की आकांक्षा।

समण संस्कृति

51. व्रतों की विश्रुत विधा यह श्रमण संस्कृति से चली, अविच्छिन्न परंपरा अध्यात्म ढांचे में ढली। साधना आराधना हित शरच्चंद्र-समुज्ज्वला, चली ज्यों चलती रहे, जिनधर्म की अविकल कला ॥

व्रत स्वीकार करने की यह प्रसिद्ध विधा श्रमण संस्कृति से विका है। इसकी परंपरा अध्यात्म के सांचे में ढली हुई है और अविच्ि प में चल रही है।
श्रावक के बारह व्रत जिनधर्म (अगार धर्म) की परिपूर्ण कला है। स्व धना को सफल बनाने के लिए शरद ऋतु के चंद्रमा के समान उज् तों की यह धारा जिस रूप में बही है, आगे भी इसी प्रकार बहती रहेम जीवन क है। उपभोक्ता मूल्योंवाले इस युग में भी जैन परिवारों में कुछ व्रतों अनुष्ठान के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह परंपरा की अव्युचि का सूचक है। य्ग-परिवर्तन के बाद भी व्रतों के प्रति घनीभूत जन-आ उनके त्रैकालिक महत्त्व को उजागर करती है। इक्कीसवीं सदी की अगक में खड़ा मनुष्य व्रत-चेतना के साथ नई सदी में प्रवेश करेगा तो कु खतरों के बीच में भी अपने अस्तित्व को सुरक्षित रख सकेगा।

श्रावक के विश्राम

52. भारवाही श्रमिक के विश्राम की परिकल्पना, पढे ‘ठाणं’ में चतुर्विध सहज सुखद विकल्पना। श्रावकों के लिए त्यों विश्राम व्रत-आराधना, सदा सविधि विवेकपूर्वक शांतमन हो साधना ॥
(रामायण)
53. शील-अणुव्रत-गुण-आराधन, श्रावक का पहला विश्राम।
सामायिक देशावकाश व्रत आत्मरमण का दूजा धाम ॥
54. चतुर्दशी अष्टमी आदि को, पूर्णरूप से हो पौषध ।
अंतिम संलेखन संथारा, अनुपम आध्यात्मिक औषध ॥ (युग्मम्)प्रतीत होती है।

श्रावक के मनोरथ

(लावणी)

55. श्रावक के तीन मनोरथ सही श्रव्य हैं, मनसा वचसा सततं ध्यातव्य नव्य हैं। प्रायोगिक हैं, प्रयोग करना यदि जानें, जीवन-परिवर्तन की सरणी पहचानें ॥

(सहनाणी)

56. कब आएगा वह धन्य दिवस, जब अपरिग्रही बनूंगा मैं। कब आएगा वह धन्य दिवस, घर त्याग मुनिव्रत लूंगा मैं। कब आएगा वह धन्य दिवस, अनशन आमरण करूंगा मैं। जीने के मोह, मौत-भय से बन मुक्त समाधि वरूंगा मैं॥

श्रावक-प्रतिमा
(लावणी)
57.अवसर पर ग्यारह प्रतिमा श्रावक धारें, 
कर सविधि साधना जीवन स्वयं निखारें। 
दर्शन से श्रमणभूत तक बढ़ते जाएं, 
जैनागम इनका विवरण विशद बताए॥
उपयुक्त समय आने पर श्रावक ग्यारह प्रतिमा (साधना के कि प्रयोग) स्वीकार करें। उनकी विधिवत साधना कर अपने जीवन को निदा देते रहें। पहली प्रतिमा का नाम है दर्शन और ग्यारहवीं प्रतिमा कान है श्रमणभूत। श्रावक दर्शन से श्रमणभूत प्रतिमा तक आगे बढ़ते रहें। के आगम दशाश्रुतस्कंध में इनका विस्तृत वर्णन मिलता है।
समय-
विधि – ग्यारहवीं प्रतिमा वाला बाला
अथवा लोच करता है। साधु का आचार, भंडोपकरण एवं वेश धारण करता है। वह साधु-वेश धारण कर ईर्या आदि साधु-धर्मों का अनुपालन करता हुआ विचरण करता है। वह भिक्षा के लिए गृहस्थों के घरों में प्रवेश कर कहता है- प्रतिमासंपन्न श्रमणोपासक को भिक्षा दो।’ साधु की तरह रहने पर भी वह स्वयं को श्रमणोपासक ही मानता है। इस संदर्भ में एक बात ज्ञातव्य है कि प्रतिमाधारी श्रावक भिक्षा के लिए केवल ज्ञातिजनों के घरों में ही जाता है, क्योंकि उनसे उसका प्रेम-बंधन जुड़ा रहता है।
करता
(नोट-अगली प्रतिमा में पहली प्रतिमा का त्याग यथावत चालू रहता है)
महास्कंध
(सोरठा)

58. चार महाश्रवद्वार, महास्कंध नाम्ना विदित । आजीवन परिहार, वर सक्षम श्रावक करें ॥
(मुक्त छन्द)

59. महास्कंध से मुक्त महाश्रावक कहलाए,
 जीवनभर अब्रह्मचर्य का त्याग निभाए। 
निशि भर खान न पान, सचित्त न भक्ष्य बनाए, कंदमूलभोजी वे कभी नहीं कहलाए।
चार महाश्रवद्वार हैं। वे महास्कंध के नाम से प्रसिद्ध हैं। उत्तम और शक्तिसंपन्न श्रावक उनका जीवनभर के लिए त्याग करे।
चार महास्कंध का त्याग करने वाला महाश्रावक कहलाता है। वह जीवनभर अब्रह्मचर्य का त्याग करता है। जीवनभर रात्रि में खाने-पीने का त्याग करता है। जीवनभर सचित्त भोजन-पानी का त्याग करता है और जीवनभर कंदमूल का त्याग करता है।
के स्थान पर ‘कंदमूल’ को स्कंध रूप में स्थापित कर दिया।
60. नई विधा से भी हो महास्कंध का वर्जन,
 रूढ़िमुक्ति, आसक्तिमुक्ति आवेश-विसर्जन । अप्रामाणिक वृत्ति कभी क्यों जगे हृदय में ?
 अनाग्रही चिंतन हो अनेकांत की लय में॥
प्रायोगिक रूप में नई विधा से भी चार महास्कंधों की कल्पना की
1. रूढ़ि, 2. आसक्ति, 3. आवेश और 4. अप्रामाणिक वृत्ति। इन महास्कंधों का भी वर्जन किया जाए। महास्कंधों से विरत जैन श्रावक अनेकान्त के महत्त्व को समझकर अपने चिंतन में अनाग्रह का विकास करें।
दीर्घकालावधि की दृष्टि स देता है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में उनका निर्यात अधिक चलता है, जो ईमानदार हैं। ‘काठ की हांडी दूसरी बार नहीं चढ़ती – यह कहावत इसी सचाई को चरितार्थ करती है।
दैनिक प्रत्याख्यान

(लावणी)

रूढ़ि के नहीं है। को जन्म ाती है, छोड़ती

61. महनीय महाश्रावक की हो दिनचर्या, 
बढ़ती ही जाए जीवन की जागर्या। 
जो हर-हमेश व्रत की सीमा संकोचे,
 नव नियम निरंतर प्रातः प्रत्यालोचे ॥

62. खाद्यों की सीमा’ वस्त्रों का परिसीमन²,
 पानी-बिजली का हो न अपव्यय धीमन !
 यात्रा-परिमाण मौन प्रतिदिन स्वाध्यायी’,
 हर रोज विसर्जन’ अनासक्ति वरदायी।
 हो सदा संघ-सेवा सविवेक सफाई’, 
प्रतिदिवस रहे इन नियमों की परछाईं ॥
जीवन में विशेष जागृति लाने के लिए महाश्रावक की दिनचर्या को महत्त्वपूर्ण बनाना आवश्यक है। इस दृष्टि से वे स्वीकृत व्रतों की सीमा को निरंतर संक्षिप्त करते रहें। यह तभी संभव है जब वे प्रतिदिन प्रातःकाल नौ नियमों का प्रत्यालोचन कर दैनिक प्रत्याख्यान करें। उनके जीवन पर कम-से-कम निम्ननिर्दिष्ट नौ नियमों का प्रभाव अवश्य रहे-
खाद्य पदार्थों की सीमा।
वस्त्रों की सीमा।
पानी, बिजली के अपव्यय से बचना।
यात्रा की सीमा।
मौन
स्वाध्याय
विसर्जन
संघ-सेवा
स्वच्छता
जीवनशैली
63. ‘मैं जैनी हूं’ जनता में धाक जमाए, 
खोकर भी लाख, न अपनी साख गमाए। 
श्रमणोपासक होना सौभाग्य-घड़ी है,
 धार्मिक संस्कृति की संजीवनी जड़ी है।
श्रावकों को अपने जैन होने का गौरव बना रहे। वे जनता में अपने जैन होने का प्रभाव छोड़ें। जैन श्रावक की अपनी प्रतिष्ठा होती है। ‘जाए लाख रहे साख’-इस कहावत के अनुसार जैन श्रावक लाखों रुपए खोकर भी अपनी साख को बचाते हैं। वे इस बात को भी समझते हैं कि श्रमणोपासक होना सौभाग्य की बात है। धार्मिक संस्कृति को जीवित रखने के लिए यह एक प्रकार की संजीवनी जड़ी है।
श्रावक को ऐसी मनोदशा से बचने का लक्ष्य रखना चाहिए।
64. श्रमणोपासक श्री तीर्थंकर की कृति है, 
यह विश्वमान्य अनुपम धार्मिक संस्कृति है। 
उसका विशिष्ट अवदान विधान स्मरें हम, 
जैनी जीवनशैली संगान करें हम ॥
भगवान महावीर ने साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविका रूप चार की स्थापना की। इस आधार पर कहा जा सकता है कि श्रमणोपासक णी तीर्थंकरों की कृति है। यह संपूर्ण संसार में मान्यता प्राप्त धार्मिक-स्कृति है। इसके विशिष्ट अवदान और विधान को सामने रखकर हम जीवनशैली’ गीत का संगान करें।
(लय : संयममय जीवन हो)
जैनी जीवनशैली
जो भी अपनाए सुख पाए, शैली नई-नवेली।
 बनती-बनती बन जाए, जन-जन की जीवनशैली ॥
जैनी जीवनशैली ॥ (ध्रुपर)
1. सम्यगदर्शन
65. अर्हत देव अकिंचन गुरुवर, धार्मिक त्रिपदी ध्याएं, समय-प्रबंधन स्वास्थ्य निबंधन, समुचित लाभ उठाएं, प्रतिदिन अपना आपा परखें, धरकर हृदय हथेली ॥
66. बदले हृदय व्यवस्था बदले, बने विधायक दृष्टि, नहीं निषेधक भाव बढ़ें, यह सम्यगदर्शन सृष्टि, अविवेकी अंधानुकरण की क्यों हो वृत्ति विषैली ॥
जैन श्रावक की अपनी जीवनशैली है। एक अपेक्षा से ही यह अभिनव बली है। इसे जो अपनाता है, वह सुखी बन जाता है। आज जो जैन जीवनशैली है, वह धीरे-धीरे जन-जन की जीवनशैली बने, यह अपेक्षित है।
जैन जीवनशैली का पहला आयाम है सम्यगदर्शन । सम्यगदर्शन के आधारभूत तत्त्व तीन हैं-
समन्वय
पाएगी। इस दृष्टि से हृदय
संयोग आवश्यक है।
निषेधात्मक भाव जीवन को सही रूप से समझने और जीने में बाधक बनते हैं। निषेधात्मक भावों की प्रबलता दृष्टिकोण को मिथ्या बनाती है। जैन साहित्य की भाषा में हिंसा, असत्य आदि अठारह पाप निषेधात्मक भाव हैं। विधायक दृष्टिकोण को पुष्ट करके इन भावों से बचा जा सकता है।
समाज में अंधविश्वास और अंधानुकरण की प्रवृत्ति भी चलती है इस प्रवृत्ति के मूल में भी मिथ्या दृष्टिकोण का प्रभाव काम करता है सम्यगदर्शन पुष्ट होने से अंधानुकरण की वृत्ति से भी छुटकारा मिल जाता =। इस समग्र विस्तार का सार इतना ही है कि सत्य के प्रति श्रद्धा-य सम्यगदर्शन का केंद्र है। अन्य सारी बातें उसकी परिधि में हैं।
2.अनेकांत
67.अनेकांत सिद्धांत सामने टिके न कोई विग्रह, 
प्रेक्षाध्यान-प्रयोगों से आवेश वृत्ति का निग्रह, 
सोच बने सापेक्ष लचीली, क्यों अनमनी अकेली ॥
जैन जीवनशैली का दूसरा आयाम है अनेकांत। अनेकांत का सिद्ध रामने हो तो वहां किसी प्रकार का विग्रह नहीं टिक पाता। विग्रह का प्रमु कारण है व्यक्ति का आवेश। उसे दूर करने में प्रेक्षाध्यान के प्रयोग बह पयोगी हो सकते हैं। व्यक्ति का चिंतन सापेक्ष और लचीला रहे तो उस राशा और संकीर्णता को अवकाश ही नहीं रहेगा।
अनंत धर्मात्मक वस्तु के एक धर्म को ग्रहण करने वाले अभिप्राय नाम नय है। एक वस्तु के बारे में जितने विचार हो सकते हैं. वे सब व्य कहलाते हैं। नय का उपयोग एक-एक धर्म को समझने के लिए किय पता है। अनेकांत सब धर्मों को एक साथ ग्रहण करता है, पर तत्त्व क तिपादन करते समय मुख्यता और गौणता की विवक्षा को अस्वीकार नह रता। ऊपर निदर्शित खेती का दृष्टांत इसी सचाई को प्रकट करता है।
अहिंसा
68.बचें अनावश्यक हिंसा से, अनाक्रमण की वृत्ति,
 आत्म-हनन या भ्रूण-हनन की क्यों हो क्रूर प्रवृत्ति, विकसित हो कारुण्य चेतना, अपनी सजग सहेली ॥
जैन जीवनशैली का तीसरा आयाम है अहिंसा। उसका विकास क लिए श्रावक अनावश्यक हिंसा से बचते रहें, अपनी ओर से किसी क्रमण न करें तथा आत्महत्या और भ्रूणहत्या जैसे क्रूर कार्यों से । उनके हृदय में करुणा की चेतना का विकास हो। क्योंकि वही उन जागरूक सहेली बनको एक चुनौती के रूप में लेना चाहिए।
4. समण संस्कृति
69. सम शम श्रम का संगम, सदा श्रमण संस्कृति का रास्ता, 
प्रवंचना का क्यों प्रपंच, अपने पौरुष में आस्था, 
कड़वाहट की बात न, सब को मीठी गुड़ की भेली ॥ सकती है।को स्थान दिया गया है।
5. इच्छा-परिमाण
70. इच्छा का परिमाण भोग-संग्रह का सीमाकरणं, हिंसाजन्य प्रसाधन सामग्री का अस्वीकरणं, अर्जन साथ विसर्जन हो, यह अनासक्ति अलबेली ॥
जैन जीवनशैली का पांचवां आयाम है इच्छा का परिमाण। इससे व्यक्तिगत भोग और संग्रह की सीमा होती है। क्रूर हिंसाजनित प्रसाधन-सामग्री का परिहार होता है और अर्जन के साथ विसर्जन की मनोवृत्ति का विकास होता है। इच्छा का परिमाण अनासक्ति का अनूठा उदाहरण है।
को स्थान दिया गया है।
सम्यक आजीविका
आय-नियामक दुविधाशामक सूत्र जैन जीवन का,
 लोक-घृणित व्यवसाय-विवर्जन लक्ष्य शुद्ध साधन का, प्रवाहपाती प्रदूषणों से, क्यों हो गंगा मैली ? ॥
जैन जीवनशैली का छठा आयाम है सम्यक आजीविका। यह आय के स्रोतों का नियमन करता है, अनियंत्रित स्रोतों के कारण पैदा होने वाल दुविधा से बचाता है, लोक में घृणित माने जाने वाले व्यवसायों से दू रखता है और व्यापार में भी साधन-शुद्धि के लक्ष्य को प्रमुखता देता है जिन उद्योग-धंधों से प्रदूषण बढ़ता हो, उनसे बचा जाए तो गंगा के मलिन होने का खतरा नहीं रहेगा।
7.सम्यक् संस्कार
72. सम्यक संस्कारों के संरक्षण का कार्य सुकर हो, 
पर्व-उत्सवों में व्यवहारों में जैनत्व मुखर हो, 
संस्कारी आलेख चित्र सज्जा घर-घर रसरेली ॥
जैन जीवनशैली का सातवां आयाम है-सम्यक संस्कार। संस्कार की सुरक्षा का काम सरल करने के कुछ उपाय निम्न निर्दिष्ट हैं-
पर्वों और उत्सवों के अवसर पर ऐसी कार्यपद्धति का विकास हो जिसमें जैनत्व बोले।
व्यवहार में ऐसे प्रयोग किए जाएं, जिनसे जैनत्व को उभरने क मौका मिले।
वाक्य-लेखन, चित्र-निर्माण, गृहसज्जा आदि में जैनत्व क प्रधानता दी जाए।
इन उपायों को काम में लेने से घर-घर में सम्यक संस्कारों का प्रवाह होसकता है।
8. आहार-शुद्धि व व्यसन-मुक्ति
73. आमिष मद्य नशीले द्रव्यों का संपर्क कभी क्यों? व्यसन-मुक्त चर्या श्रावक की, इसमें तर्क कभी क्यों
 खाने-पीने का संयम, क्यों उलझे स्वास्थ्य-पहेली ॥
जैन जीवनशैली का आठवां आयाम है आहार-शुद्धि और व्यसर मुक्ति। श्रावक के लिए मांस, शराब आदि अभक्ष्य तथा नशीले पदार्थों सेवन और संपर्क ही वर्जित है। जैन श्रावक की चर्या सहज रूप में व्यसन मुक्त होती है। इसमें कभी किसी तर्क को अवकाश ही नहीं है। खान-ए का संयम सबसे पहले आवश्यक है। खाद्य-संयम सध जाए तो स्वास्थ की पहेली सहज रूप में सुलझ सकती है।
संख्या में लोग मांसाहार छोड रहे हैं। क्यों? उनके सामने अहं प्राप्त। स्वास्थ्य का। जैन श्रावक के लिए आहार-शुद्धि और आहार-संयम ३ बात नैतिकता. अध्यात्म या धर्म का पहलू है वैसे ही स्वास्थ्य का ही प्रमुख पहलू है। इस ओर उचित ध्यान दिया जाए तो स्वास्थ्य की पत्र उलझने की नौबत टाली जा सकती है।
9. साधर्मिक वात्सल्य
74. शैली का आयाम आखिरी साधर्मिक वत्सलता, भ्रातृभाव के अभिसिंचन से संघ-कल्पतरु फलता, 
दक्षिण का इतिवृत्त श्रुतिश्रुत, दिल को छूता डेली ॥
जैन जीवनशैली का आखिरी आयाम है साधर्मिक वात्सल्य। धर्म में श्रद्धा रखने वाले लोगों के प्रति भाईचारे की भावना को सिंचन से संघ रूप कल्पवृक्ष फलता-फूलता है। इस विषय में कानों सुना भारत के जैनों का इतिहास हमेशा दिल को छूता रहता है।
75. नव-आयामी शुभ परिणामी शैली सतत प्रवाहित, 
त्रैकालिक तात्कालिक विविध समस्या स्वयं समाहित, ‘
तुलसी’ वर विवेक जागरणा, पाई चित्रावेली॥
नौ आयामों वाली और शुभ फल लाने वाली यह जैन जीवनबेल निरंतर गतिशील रहे। इससे मनुष्य की शाश्वत और सामयिक विविध प्रकार की समस्याएं सुलझती हैं। मेरी दृष्टि में यह चित्राबेली-एक ऐसी बेल, जिसके स्पर्श से पदार्थ अखूट हो जाता है-की उपलब्धि है। इसपे मनुष्य के सद्विवेक की जागरणा होती रहे, यही काम्य है।

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