Vrat Diksha (12Vrat Sadhna)

व्रत दीक्षा

श्रावक की पहली भूमिका है- सम्यक्त्व दीक्षा। सम्यक्त्व की पुष्टि के बाद श्रावक की दूसरी भूमिका व्रत-दीक्षा स्वीकार की जाती है। व्रत-दीक्षा का अर्थ है-असंयम से संयम की ओर प्रस्थान। एक गृहस्थ श्रावक पूरी तरह से संयमी नहीं हो सकता, पर वह असंयम की सीमा कर सकता है। इसी दृष्टि से भगवान महावीर ने उसके लिए बारह व्रत रूप संयम धर्म का निरूपण किया। अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षाव्रत रूप बारह व्रत एवं तेरहवां मारणान्तिक संलैखना, यही व्रत दीक्षा है।
स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत
मैं स्थूल प्राणातिपात का प्रत्याख्यान करता हूं/करती हूं
1. आजीवन निरपराध त्रस प्राणी का संकल्पपूर्वक वध करने का त्याग करण संयोग से।
2. अपराधी प्राणी को भी पानी में डुबोकर, आग में डालकर, विष प्रयोग कर मारने का त्याग… करण ….. योग से।
3. क्रोधवश, लोभवश किसी प्राणी को कठोर बंधन में बांधने, कठोर प्रहार करने, उस पर अधिक भार लादने, नाक, कान आदि काटने, डाम लगाने, खाल उतारने का त्याग. करण………. योग से।
4. किसी मनुष्य को बलात अनुशासित करने, उस पर आक्रमण करने, उसे पराधीन करने, अस्पृश्य मानने का त्याग योग से। करण
5. अपने आश्रित नौकर, चाकर आदि तथा गाय, भैंस, बैल, घोडे आदि के काम न करने पर आवश्यक खानपान बंद करने का त्यागे करण………. योग से।
व्रत दीक्षा
6. आत्महत्या करने का त्याग।
4.
श्रावक चूंकि पूर्ण अहिंसक नहीं हो सकता। उसने निरपराध को संकल्पपूर्वक न मारने का व्रत लिया है। जो प्राणी उसकी जीवनचर्या में बाधक बनते हैं उनकी हिंसा का उसके त्याग नहीं है अतः श्रावक के निम्नलिखित प्रवृत्तियों से व्रत भंग नहीं होता –
5
मक्खी, मच्छर, खटमल, दीमक, जाला, चूहे आदि हटाने के लिए फ्लिट करना, दवा छिड़कना, धुआँ छोड़ना आदि करना पड़े।
6
धान्य, मिर्च, मसाले आदि साफ करना पड़े।
डाक्टरी सीखते-सिखाते समय हिंसा का प्रयोग करना, कराना पड़े।
किसी व्यवस्था विशेष से जुड़े होने के कारण कोई हिंसात्मक आदेश देना पड़े।
क्रोधवश, लोभवश, विशेष परिस्थितिवश, असावधानीचश जीव हिंसा हो जाए।
किसी की आदत सुधारने की दृष्टि से कठोर अनुशासन करना पड़े।
1मैं स्थूल स्थावर जीवों की हिंसा का निम्न प्रकार से त्याग करता हूं/करती
पृथ्वीकाय
1. नया मकान अपने परिवार के लिए नींव लगाकर…. के उपरांत मेरे आदेश से बनाने का त्याग…करण योग से।
2. शिला-लोढा, चक्की आदि को एक वर्ष में टंचाने का त्याग……… करण……… योग से। बार से अधिक
3. वर्षभर में घर खर्च के लिए नमक ……. किलोग्राम से अधिक खरीदने का त्याग करण………. योग से।
4. खेती, बाग आदि मेरे हाथ से ………. एकड़ जमीन से अधिक लगाने का त्याग करण योग से।
5. कुंड, हौद, टंकी, कुआँ, बावड़ी आदि से अधिक बनाने का त्याग करण………. योग से।
6. मकानों की मरम्मत एक वर्ष में बार से अधिक कराने का त्याग करण………. योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
सार्वजनिक स्थान बनाना पड़े या चंदा देना पड़े।
विवाह, शादी आदि प्रसंगों में नमक आदि अधिक मंगाना पड़े।
अप्काय
1. बिना छना हुआ पानी पीने का त्याग करण…….. योग से।
(घर से बाहर या विशेष परिस्थिति अपवाद है।)
2. एक दिन में अपने निमित्त नहाने व कपड़ा धोने में घड़ा/पीपा/बाल्टी पानी से अधिक काम में लेने का त्याग………… करण………. योग से।
3. नदी, तालाब, समुद्र, स्वीमिंग पुल आदि में बार से अधिक स्नान करने का त्याग करण. योग से।
4. नदी, समुद्र या तालाब की यात्रा करने का त्याग या बार से अधिक करने का त्याग करण….. योग से।
टूटी से अधिक चलाने 
5. घर की टूटियों के अतिरिक्त एक दिन में का त्याग………. करण………. योग से।
6. गंगा में फूल घालने का त्याग।
वायुकाय
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
विवाह-शादी आदि के प्रसंग, सार्वजनिक उपयोगिता या विशेष परिस्थितिवश, असावधानीवश, विस्मृतिवश या चिकित्सावश अधिक पानी का उपयोग करना पड़े या हो जाए।
तेजस्काय
1. होली हाथ से जलाने का त्याग……… करण योग से।
2. आतिशबाजी करने का त्याग…. करण योग से।
बार से अधिक करने का त्याग… करण योग से। 
3. दीवाली, लग्नप्रसंग, ऑपनिंग आदि प्रसंगों में लाइटिंग
4. चूल्हा, गैस चूल्हा, स्टोव, हीटर, एयरकंडीशनर, कूलर आदि एक दिन में………… संख्या से अधिक जलाने का त्याग करण ……… योग से।
 5. लालटेन, टॉर्च, मोमबत्ती, अगरबत्ती, धूपिया, बिजली, पंखे आदि एक दिन में……. से अधिक जलाने / चलाने का त्याग..करण……. ……….योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
एक ही साधन को अनेक बार काम में लेना।
एक ही स्विच से अनेक बिजली जल उठे।
असावधानी या विस्मृति हो जाए।
व्रत्त दीक्षा
वायुकाय
…….. योग से। 1. पंखे एक दिन में अपने हाथ से से अधिक चलाने का त्याग करण
2. एक दिन में बार से अधिक झूला झूलने का त्याग…….. करण योग से।
3. पतंग उड़ाने का त्याग या………. से अधिक उड़ाने का त्याग………. करण………. योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
एक स्विच से अनेक पंखे चलने लग जाएं।
रोगी, मेहमान आदि के लिए पंखे चलाने पड़ें।
सभा, संस्थान आदि में आवश्यक सेवा देते समय चलाना पड़े।
असावधानी या विस्मृति हो जाए।
वनस्पतिकाय
1. अपनी बाथ में आए उससे बड़ा हरा वृक्ष हाथ से काटने का त्याग ……….. करण……….. योग से।
2. जमीकंद का छेदन-भेदन एक दिन में … करने का त्याग……. करण योग से। किलोग्राम से अधिक
3. जमीकंद खाने का त्याग या………. से अधिक एक दिन में खरीदने का त्याग………. करण………. योग से।
4. एक दिन में ………. से अधिक हरी सब्जी एवं फल के आरंभ समारंभका त्याग. करण………. योग से।
व्रत दीक्षा
5. एक दिन में…. में………..प्रकार के फल एवं प्रकार की सब्जियों से अधिक खाने का त्याग……… करण………. योग से।
3.
6. घर में लगे पौधों को अपने हाथ से महीने में ……… बार से अधिक काटने-छांटने का त्याग………. करण………. योग से।
4
7. साल में अपने हाथ से अपने घर के निमित्त …. किलोग्राम से अधिक अचार डालने का त्याग करण योग से।
5
8. शौकिया रूप से दूब आदि पर चलने का त्याग….. करण योग से।
9. एक दिन में ……… किलोग्राम से अधिक धान्य पीसने-पिसाने का त्याग……….. करण.. योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
पड़ौसी, संबंधी या सामाजिक समारोह आदि के लिए हरियाली का छेदन-भेदन करना पड़े।
समारोह आदि के प्रसंग में सब्जी आदि में जमीकंद मिला हो वह खाने का काम पड़े।
स्थूल मृषावाद विरमण व्रत
मैं स्थूल मृषावाद का प्रत्याख्यान करता हूं/करती हूं।
1. लड़के/लड़कियों के विवाह-शादी के संबंध में असत्य बोलने का त्याग करणयोग से।
2. पशुओं के क्रय-विक्रय के संबंध में असत्य बोलने का त्याग …………करण……….. योग से।
3. खुली जमीन या मकान के संबंध में असत्य बोलने का त्याग……….. करण………. योग से।
4. धरोहर को वापस लौटाने से इन्कार करने का त्याग करण ……….. योग से।
5. झूठी गवाही देने का त्याग करण…. योग से।
6. जानबूझकर किसी पर दोषारोपण करने या किसी का मर्म प्रकाशन करने का त्याग…… करण योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
हँसी-मजाक में या सुनी-सुनाई बात को लेकर कुछ कह दिया जाए।
विशेष कानूनी अड़चन आने पर हस्ताक्षर करना पड़े।
कोई व्यक्ति परिवार से छुपाकर गिरवी रखकर गया हो।
स्थूल अदत्तादान विरमण व्रत
मैं स्थूल अदत्तादान (चोरी) का प्रत्याख्यान करता हूं/करती हूं।
1. किसी के मकान की दीवार, ताला आदि तोड़कर चोरी करने का त्याग करण योग से।
2. किसी की पड़ी वस्तु मालिक की जानकारी होने के बाद रखने का त्याग …………करण………. योग से।
3. राज्य निषिद्ध वस्तु रखने एवं चोर को चोरी में सहायता देने का त्याग योग से।
4. जानबूझकर कम तोल-माप करने, बेमेल मिलावट करने व नकली को असली बताकर बेचने का त्याग ………. करण………. योग से।
व्रत दीक्षा
5. अशक्य परिस्थिति के सिवाय कर की चोरी करने का त्याग………. करण………. योग से।
6. जानबूझकर बिना टिकिट यात्रा करने का त्याग योग से। करण ..
7. रिश्वत लेने का त्याग करण योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
बेटे-बहू आदि को सावधान करने हेतु कोई वस्तु छिपानी पड़े।
सोने-चांदी आदि में खाद जो सामान्यतया मिलती है।
नई-पुरानी वस्तु मिलानी पड़े।
अनजान में चोरी की वस्तु रह जाए।
स्वदार संतोष व्रत
मैं स्थूल मैथुन का प्रत्याख्यान करता हूं/करती हूं
1. स्वपति/स्वपत्नी के सिवाय किसी के साथ मैथुन सेवन का त्याग करण………. योग से।
2. अप्राकृतिक मैथुन सेवन का त्याग करण….. योग से।
3. स्वपति/स्वपत्नी के साथ ……… महीने में ……….. दिन उपरांत अब्रह्मचर्य सेवन का त्याग करण… योग से।
4. किसी क्लब या रंगमंच पर परपुरुष/परस्त्री के साथ अश्लील नृत्य करने का त्याग…. करण. योग से।
5. बेमेल विवाह (उम्र से दो तिहाई (30/10) का त्याग योग से। करण
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
विशेष परिस्थिति या विस्मृति से मर्यादा का लोप हो जाए।
इच्छापरिमाण व्रत
मैं स्थूल परिग्रह का प्रत्याख्यान करता हूं/करती हूं।
1. खुली जमीन, मकान व खेती के लिए……… एकड़ से अधिक रखने का त्याग ………. करण. योग से।
2. मेरे खुद के नाम से मकान से अधिक रखने का त्याग … करण योग से।
3. सोना करण तोला, चांदी ….. तोला से अधिक रखने का त्याग योग से।
4. साल में योग से। से अधिक पशु रखने का त्याग ………. करण.
5. नकद रुपये……हीरा…….. माणक …….. मोती आदि परिमाण से अधिक रखने का त्याग करण योग से।
6. ऑफिस-दुकान गोदाम ……….. फैक्ट्री गैरेज गेस्ट हाउस से अधिक अपने नाम पर रखने का त्याग योग से।
7 घर खर्च के लिए एक वर्ष में क्विंटल से अधिक अनाज आदि रखने का त्याग………. करण योग से।
8. बर्तन ………..घरेलू सामान आदि वर्तमान कीमत के हिसाब से ………लाख से अधिक कीमत का एक साल में अपने हाथ से खरीदने का त्याग करण………. योग से।व्रत दीक्षा
9. संतान की सगाई, विवाह के उपलक्ष्य में रुपये आदि लेने का ठहराव करने का त्याग करण……. योग से।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
कोई सुरक्षा के लिए अपनी सम्पत्ति रख जाए।
किसी को देने का निर्णय होने के बाद मेरे पास पड़ा रहे।
कानून विधि से बचाव के लिए जमा खर्च करना पड़े।
विवाह आदि प्रसंग, सामाजिक प्रसंग या विशेष परिस्थितिवश करना पड़े।
दिग्व्रत
मैं दिशाओं का परिमाण करता हूं/करती हूं।
1. मैं अपने निवास स्थान या व्यापार क्षेत्र जहां भी रहूं, वहां से एक दिन में कि.मी. से अधिक पूर्व में कि.मी. से अधिक पश्चिम में ………..कि.मी. से अधिक उत्तर में. कि.मी. से अधिक दक्षिण में………. कि.मी. से अधिक पाताल में कि.मी. से अधिक आकाश में जाने का त्याग………. करण. योग से।
देशों से 2. विश्व भ्रमण की दृष्टि से वर्ष भर में……….. कि. मी. या अधिक में जाने का त्याग।
3. मर्यादित क्षेत्र में एक दिशा के परिमाण को घटा कर दूसरी दिशा के परिमाण को बढ़ाने का त्याग करण योग से।
4. मर्यादा क्षेत्र में संशय होने पर भी उसका अतिक्रमण किया हो। जैसे 100 कि.मी. की मर्यादा रखी या 200 की, इस स्थिति में 100 से आगे जाना।
व्रत दीक्षा
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
धर्मप्रचार, चिकित्सा, संघीय सेवा, गुरुदर्शन, कोर्ट केस आदि विशेष स्थिति में जाना पड़े।
भोगोपभोग परिमाण व्रत –
1. अपने शरीर पर पहनने के लिए साल भर में नये बनवाने व खरीदने का त्याग तथा …. वस्त्र खरीदने का त्याग। ड्रेसों से अधिक मीटर से अधिक नया
2. हाथ व शरीर पोंछने के लिए प्रतिदिन… रुमाल. से अधिक काम में लेने का त्याग। तोलिया
3. दांत साफ करने के लिए प्रतिदिन आदि से अधिक काम में लेने का त्याग। प्रकार के दौन, नजन
4. स्नान के लिए एक दिन में………. तरह के साबुन का त्याग। शैंपू, आंवला आदि का पाउडर बार से अधिक प्रयोग करने
5. मालिश के लिए त्याग। प्रकार के तेलों से अधिक काम में लेने का
…. बार दही. मिट्टी आदि 6. शरीर पर पीठी करने के लिए एक दिन में प्रकार के पदार्थों से अधिक काम में लेने का त्याग।
7. एक दिन में बार से अधिक स्नान करने का त्याग या किलोग्राम से अधिक पानी के उपयोग का त्याग।
8. एक दिन में जोड़ी कपड़ों से अधिक पहनने का त्याग ……… करण………. योग से।
9. शौक के निमित्त से अधिक खुशबूदार पदार्थ के विलेपन का त्याग।
10. एक दिन में……. जाति से अधिक किस्म के फूल सूंघने का त्याग।
11. एक दिन में ….. तोला सोना……… तोला चांदी से अधिक पहनने का त्याग।
12. एक दिन में पानी के अतिरिक्त प्रकार के पेय द्रव्य से अधिक लेने का त्याग।
13. एक दिन में …….. प्रकार से अधिक धूप या अगरबत्ती आदि काम में लेने का त्याग।
14. एक दिन में प्रकार की मिठाई प्रकार की नमकीन से अधिक का त्याग।
15. एक दिन में ………. प्रकार के धान्य से अधिक का प्रयोग करने का त्याग।
16. एक दिन में…..प्रकार की दाल सूप, सलाद आदि से अधिक का उपयोग करने का त्याग।
17. एक दिन में………. विगय से अधिक लेने का त्याग।
एवं………. से अधिक हरी सब्जी, फल खाने का त्याग। 18. जमीकंद खाने का त्याग या एक दिन में ………. से अधिक जमीकंद
19. एक दिन में………प्रकार के मेवे से अधिक खाने का त्याग।
20. एक दिन में …….. बार से अधिक अपने या दूसरे के घर खाने का त्याग।
21. एक दिन में ……… तरह के पानी से अधिक या… किलो से अधिक पीने का त्याग।
व्रत दीक्षा
22. एक दिन में मुखवास के पदार्थ बार से अधिक खाने का स्थाग।
23. एक दिन में ………. से अधिक सवारी करने का त्याग।
24. एक दिन में से अधिक जूते या चप्पल खरीदने तथा……… से अधिक पहनने का त्याग।
25. सोने के लिए से अधिक पलंग, गद्दा, तकिया, चद्दर आदि के प्रयोग का त्याग।
26. एक दिन में ……….द्रव्य से अधिक खाने का त्याग व एक दिन में …………से अधिक सचित्त का प्रयोग करने का त्याग।
27. शराब, मांस, अण्डे एवं समस्त प्रकार के मादक द्रव्यों का आजीवन त्याग।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं-
बीमारी, यात्रा या पदार्थ के गुम हो जाने पर दूसरा काम में लेना पड़े।
वस्तु-परीक्षण के लिए किसी पदार्थ को सूंघना पड़े।
अनजान में किसी वस्तु की मिलावट हो जाए।
भूल से किसी दूसरे के जूते पहन लिए जाएँ।
खरीदते समय कई कपड़े पहन कर देखने पड़ें आदि-आदि।
अनजान में परिमाण का अतिक्रमण हो जाए।
व्रत दीक्षा
पन्द्रह कर्मादान (अधिक हिंसाजन्य व्यवसाय)
श्रमणोपासक के लिए मर्यादा के उपरांत पन्द्रह कर्मादान अनाचरणीय हैं।
1. अंगारकर्म
अग्निकाय के महाआरंभवाला कार्य।
2. वनकर्म
जंगल को काटने का व्यवसाय।
3. शाकटकर्म
वाहन चलाने का व्यवसाय।
4. भाटककर्म
किराये का व्यवसाय।
5. स्फोटकर्म
खदान, पत्थर आदि फोड़ने का व्यापार।
6. दन्तवाणिज्य
हाथीदांत, मोती, सींग, चर्म, अस्थि आदि का व्यापार।
7. लाक्षावाणिज्य
लाख, मोम आदि का व्यापार।
8. रसवाणिज्य
घी, दूध, दही तथा मद्य, मांस आदि का व्यापार।
9. विष वाणिज्य
कच्ची धातु, संखिया, अफीम आदि विषंली वस्तु तथा अस्त्र-शस्त्र आदि का व्यापार।
10. केशवाणिज्य
चमरी गाय, घोड़ा, हाथी तथा ऊन एवं रेशम आदि का व्यापार।
11. यन्त्रपीलनकर्म
ईख, तिल आदि को कोल्हू में पीलने का धंधा।
12. निर्लाछनकर्म
बैल आदि को नपुंसक करने का धंधा
13. दावानलकर्म
खेत या भूमि को साफ करने के लिए आग लगाना तथ जंगलों में आग लगाना।
14. सरद्रहतड़ाग शोषण
झील, नदी, तालाब आदि को सुखाना।
15. असतीजन पोषण
दास, दासी, पशु, पक्षी आदि का व्यापारार्थ पोषण करना।
मैं इन कर्मादानों का निश्चित सीमा के साथ प्रत्याख्यान करता हूं।…… योग से। करण….
अनर्थदण्ड विरमण व्रत
मैं अनर्थदण्ड का प्रत्याख्यान करता हूं/करती हूं।
अनर्थदण्ड अर्थात बिना प्रयोजन पापकारी प्रवृत्ति करना। मुख्य रूप से अनर्थदण्ड के चार प्रकार बताए गए है –
अपध्यानाचरित, प्रमादाचरित, हिंस्रप्रदान, पापकर्मोपदेश।
इनके अतिरिक्त असावधानी, मनोरंजन, आलस्य आदि अनर्थहिंसा के अनेक कारण हो सकते हैं। इन कारणों के आधार पर मैं अनर्थदण्ड से बचने के लिए निम्नलिखित संकल्प स्वीकार करता हूं/करती हूं।
1. आजीवन जुआ व सट्टा खेलने का त्याग।
2. बिना प्रयोजन किसी को पापकार्य का उपदेश देने का त्याग। जैसे-जुआ खेलना, हत्या करना, डाका डालना आदि की सलाह।
3. में आर्त्तध्यान व रौद्रध्यान बढ़ाने वाले आचरण से बचता रहूंगा/बचती रहूंगी। जैसे – किसी का वियोग होने पर प्रथारूप से रोना, किसी को दुःखी देखकर प्रसन्न होना आदि।
4. बिना प्रयोजन किसी को तलवार, बंदूक, कुदाली आदि हिंसात्मक साधन देने का त्याग। 
सामायिक व्रत
मैं प्रतिदिन कम से कम एक सामायिक अवश्य करूंगा/करूंगी। विशेष परिस्थितिवश न हो सके तो अगले दिन दो सामायिक करने का लक्ष्य रखूंगा/ रखूंगी।
विवशता, यात्रा, विस्मृति, अस्वस्थता आदि।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
देशावकाशिकमें अपने स्वीकृत व्रतों में यथाशक्ति संयम करने के लिए देशावकाशिक व्रत स्वीकार करता हूं/करती हूं।
1. महीने में कम से कम नवकारसी … पोरसी………… एकासन …….. उपवास करूंगा/करूंगी।
2. रात्रि-भोजन का यावज्जीवन त्याग अथवा साधु-साध्वी मेरे गांव या एरिया की सीमा में रहें तब तक त्याग या महीने में कम से कम .. दिन रात्रि-भोजन का त्याग।
3. प्रतिदिन………… घण्टे दिन में तिविहार या चौविहार प्रत्याख्यान करूंगा/करूंगी।
श4. चौदह नियम चितारने का अभ्यास करूंगा / करूंगी।
5. दिग्व्रत में की हुई क्षेत्र सीमा से बाहर की वस्तु मंगाने, भेजने या अभिप्राय प्रदर्शित करने का त्याग …….. करण. ……… योग से।
6. कम से कम 10 मिनिट संवर की साधना करूंगा/करूंगी।
5. आवश्यकता से अधिक भोगोपभोग की सामग्री का संग्रह करने का त्याग।
6. मृत्युभोज करने का त्याग।
7. असावधानीवश घृत, तेल, पानी आदि के बर्तन खुले छोड़ने का त्याग।
8. अनावश्यक बिजली, पंखे आदि खुले छोड़ने का त्याग।
9. भोजन में जूठा छोड़ने का त्याग। (सड़ा-गला, दुर्गन्धयुक्त एवं अस्वास्थ्यकर अपवाद है।)
10. हँसी-मजाक में किसी को मानसिक आघात पहुंचे, ऐसा संवाद आदि देने का त्याग।
11. बिना प्रयोजन वृक्ष के पत्ते, टहनी, डाली आदि तोड़ने का त्याग।
12. तपस्या के उपलक्ष्य में आडम्बर करने का त्याग।
13. कामवासना बढ़ाने वाला अश्लील साहित्य पढ़ने एवं अश्लील फिल्में देखने का त्याग।
14. बिना देखे चूल्हा, स्टोव, कोयला, लकड़ी आदि जलाने का त्याग।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं-
विशेष परिस्थिति, विस्मृति या बिना विचारे अकस्मात् कुछ कर लिया जाए।
पौषध व्रत
1. मैं वर्ष में कम से कम ……अष्टप्रहरी चतुष्प्रहरी पौषध करूंगा/करूंगी।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
विशेष परिस्थिति, अस्वस्थता।
यथासंविभाग व्रत
मैं बारहवें व्रत की अनुपालना करूंगा/करूंगी।
1. शुद्ध साधु को अकल्पनीय आहार-पानी आदि जानबूझकर देने का त्याग।
2. भोजन पर बैठकर प्रतिदिन दो समय कम से कम एक दो मिनिट भावना भाऊंगा/भाऊंगी।
निम्नोक्त से व्रत भंग नहीं –
किसी साधु-साध्वी की चिकित्सा एवं भिन्न समाचारी की स्थिति में अकल्पनीय आहार आदि की व्यवस्था एवं क्रीत औषध आदि की व्यवस्था करनी पड़े, उसे मैं संघीय दायित्व समझकर करूंगा, दान समझ कर नहीं।
चौदह नियम
आवक अपने जीवन में सब प्रकार की पापकारी प्रवृत्तियों का त्याग नहीं कर सकता। फिर भी उनकी सीमा का निर्धारण कर सकता है। पाप सहित प्रवृत्ति की सीमा का निर्धारण भी आध्यात्मिक विकास का एक द्वार है। श्रावक के कुनोदेन व्यावहारिक प्रवृत्तियों के सीमाकरण का एक क्रम प्राचीन काल से चला आ रहा है, जिसमें प्रमुख रूप से चौदह बिन्दुओं का स्पर्श है। ये चौदह बिन्दु चौदह नियम की संज्ञा से अभिहित हैं-
1. सचित्तं
अन्न, पानी, फल आदि संचित्त वस्तुओं की सीमा करना।
2. द्रव्य
खाने-पीने संबंधी वस्तुओं की सीमा करना।
3. विगय छह
1. दूध, 2. दही, 3. घी, 4. तेल, 5. मिष्ट, 6. कढ़ाई – इन छह विगय के परिभोग की सीमा करना।
4. मन्त्री
जूते, मौजे, खड़ाऊ, चप्पल आदि की सीमा करना।
5. ताम्बूल
पान, सुपारी, इलायची, चूर्ण आदि मुखवास के द्रव्यों की सीमा करना।
6. वस्त्र
पहनने के वस्त्रों की सीमा करना।
7. कुसुम
फूल, इत्र व अन्य सुगंधित वस्तुओं की सीमा करना।
8. वाहन
मोटर, रेल, स्कूटर, रिक्शा आदि वाहनों की सीमा करना।
9. शयन
बिछौनों की सीमा करना।
व्रत दीक्षा
*
10. विलेपन
केसर, चन्दन, तेल आदि लेप करने वाले पदार्थों की सीमा करना।।15 प्रकार
11. अब्रह्मचर्य
मैथुन सेवन की सीमा करना।
12. दिशा
छहों दिशाओं में यातायात व अन्य जो भी प्रवृत्तियां की जाती हैं, उनकी सीमा करना।
13. स्नान
स्नान व जल की मात्रा की सीमा करना।
14. भक्त (आहार) –
अशन, पान, खादिम, स्वादिम की सीमा करना।
1. मिष्टविगय
चीनी, गुड़, शक्कर, मिश्री, तालमिश्री, बताशा, खजूर का गुड़, मखाणा, खांड, ओला आदि।
2. कढ़ाई विगय
इसके चार विकल्प हैं –
* वह वस्तु जिसे घी या तेल में तला जाए, जैसे – भुजिया, कचौरी, घेवर, जलेबी, पूड़ी, बड़े आदि।
* वह वस्तु जिसमें मिष्ट विगय डालकर गर्म किया जाए, जैसे- सीरा, बादाम की कतली, लड्डू, पेड़े, खीर आदि।
* वह वस्तु जिसमें छौंक लगे, जैसे – शाक, दाल, कढ़ी, छमका, रायता आदि।
* वह वस्तु जिसमें मिष्ट विगय मिली हो, जैसे आमरस, सिकंजी आदि।
जिस वस्तु में सहज विगय मिलाने की परम्परा न हो उसे यदि गर्न न किया जाए तो अलग विगय मानी जाएगी, जैसे दूध में चीनी डाली जाए तो दो विगय। फुलके आदि को चूर कर घी, चीनी डाली जाए तो दो विगय । चुपड़ा हुआ फुलका-रोटी, धी विगय।
* छाछ, राबड़ी बिना विगय है।
आहार के चार प्रकार –
अशन- जो भूख मिटाने के लिए खाया जाए। पान, खादिम, स्वादिम के अतिरिक्त जो भी खाद्य व पेय पदार्थ हैं वे सब अशन में हैं।
पान – पानी।
खादिम – सूखा मेवा ।
स्वादिम- मुखवास की वस्तुएं, जैसे चूरी, सुपारी, पान, लवंग, इलायची,
खाटा आदि।
श्रावक ! व्रत धारो
रचयिता : आचार्य श्री तुलसी
श्रावक ! व्रत धारो !
निज जीवन धन सम्भारो रे, जैनागम रेस विचारो रे। क्षणिक विषय सुख खातिर आतुर, मानव भव मत हारो रे।।
अव्रत नाला है दगचाला, रोकण मारग वांरो रे।
आतम रूप तलाब नाव स्यूं, करण करम जल न्यारो रे 11
हिंसा वितथ अदत्त विषय रस, लोभ, क्षोभ करणारो रे। निज मंदिर में है औ तस्कर, खोज मिटावण आंरो रे।।2।।
ईर्ष्या द्वेष असूया मत्सर, मेटण क्लेश करारो रे। कलुषित हृदय कलह स्यूं दूषित, अपणी वृत्ति सुधारो रे।।3।।
मुक्ति महल री पंचम पेड़ी, नेड़ी नजर निहारो रे। महावीर संतान-स्थान थे, कायरता न सिकारो रे।।4।।
निरय तिरय गति निगम निरोधो, व्यन्तर असुर विसारो रे। ज्योतिष ऊपर वैमानिक सुर, सीधा डेरा डारो रे।।5।।
धन्य जघन्य समय शिव सम्भव, तीन भवां निस्तारो रे। आत्मानन्द अमन्द अपूरब, व्रत-वैभव विस्तारो रे।।6।।
त्याग नाग नहिं सिंह बाघ नहिं, माग नहीं भयवारो रे। हृदय विराग भाग जागरणा, क्यूं कांपै दिल थांरो रे।।7।।
चित्त प्रधान पूणियो श्रवक, श्रावक कुल उजियारो रे। आणन्दादि उपासक बरणन, सप्तम अंग सुप्यारो रे।।8।।
शंख पोखली सूत्र भगवती, सुलसां नाम चितारों है। सती चेलणा जबर जयन्ती, ज्यूं निज जीवन तारो रे।।9।।
भिक्षु-रचित बारह व्रत चौपी, विस्तृत रूप विचारो रे। दृग गोचर अथवा श्रुति गोचर, कर कर आत्म उधारो रे।।10।।
उगणीसै निन्नाणूं वर्षे, चूरू पावस प्यारो रे।
प्राणाधिक निज व्रत-सम्पत नै, ‘तुलसी’ सदा रुखारो 11
श्रावक-व्रत संकल्प पत्र
नाम
संकल्प-स्वीकृति
पूरा पता
व्रत-धारण दिनांक:
सान्निध्य :
मैं ‘व्रत-दीक्षा’ के नियमोपनियमों का अवलोकन कर सही समझपूर्वक ऐच्छिक आगारों के साथ इन्हें स्वीकार करता हूं/करती हूं,
स्वीकर्ता
हस्ताक्षर
अणुव्रत आचार-संहिता
1 मैं किसी भी निरपराध प्राणी का संकल्पपूर्वक वध नहीं करूंगा।
आत्म-हत्या नहीं करूंगा।
भ्रूण-हत्या नहीं करूंगा।
2 मैं आक्रमण नहीं करूंगा।
आक्रामक नीति का समर्थन नहीं करूंगा।
विश्व-शांति तथा निःशस्त्रीकरण के लिए प्रयत्न करूंगा।
3 मैं हिंसात्मक एवं तोड़फोड़ मूलक प्रवृत्तियों में भाग नहीं लूंगा।
4 मैं मानवीय एकता में विश्वास करूंगा।
जाति, रंग आदि के आधार पर किसी को ऊँच-नीच नहीं मानूंगा।अस्पृश्य नहीं मानूंगा।
5 मैं धार्मिक सहिष्णुता रखूंगा।
सांप्रदायिक उत्तेजना नहीं फैलाऊंगा।
6 मैं व्यवसाय और व्यवहार में प्रमाणिक रहूंगा।
अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि नहीं पहुंचाऊंगा।
छलना पूर्ण व्यवहार नहीं करूंगा।
7.मैं ब्रह्मचर्य की साधना और संग्रह की सीमा का निर्धारण करूंगा। 
8 .मैं चुनाव के संबंध में अनैतिक आचरण नहीं करूंगा।
9. मैं सामाजिक कुरूढ़ियों को प्रश्रय नहीं दूंगा।
10 .मैं व्यसन मुक्त जीवन जीऊंगा।
मादक तथा नशीले पदार्थों-शराब, गांजा, चरस, हिरोइन, भांग,तम्बाकू आदि का सेवन नहीं करूंगा।
11 मैं पर्यावरण की समस्या के प्रति जागरूक रहूंगा।
हरे-भरे वृक्ष नहीं काटूंगा।
पानी का अपव्यय नहीं करूंगा।

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