15.Pandrve Tirthankar Bhagwan Dharmanath Ki Kahani

15thTirthnkar Bhagwan Shree Dharm Nath Ka Symbol ( Pratik) -Vajra
भगवान् श्री धर्मनाथ
तीर्थकर गोत्र का बंध
धातकी खंड की पूर्व विदेह में भदिलपुर नामक समृद्ध नगरी थी। उसके पराक्रमी राजा सिंहरथ ने धर्मगुरुओं से जब सुना कि योद्धाओं को जीतना आसान है, किंतु आत्मा पर नियंत्रण पाना कठिन है, खूंखार शेर को पकड़ना आसान है, किंतु मन और इंद्रियों को जीतना अत्यंत कठिन है, तो सुनकर राजा के दिल में उथल-पुथल मचने लगी। स्वयं के पुरुषार्थ को अब राजा ने अध्यात्म की ओर मोड़ दिया। महलों में रहता हुआ. भी वह एक संत का जीवन जीने लगा। अवकाश मिलते ही उसने अपने सुयोग्य उत्तराधिकारी को राज्य सोंपकर विमलवाहन स्थविर के पास संयम ग्रहण कर लिया।
दीक्षा के बाद राजर्षि सिंहरथ ने अपने प्रबल पराक्रम को सर्वथा आत्म शुद्धि के अनुष्ठान में जोड़ दिया। विचित्र तप, विचित्र कायोत्सर्ग और विचित्र ध्यान के मार्ग से कर्मों की महान् निर्जरा, की, और तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। अन्त में आराधक पद पाकर अनुत्तर विमान के वैजयंत स्वर्ग में वे महधिक अहमिन्द्र देव बने ।
जन्म
अहमिन्द्र पद की आयु क्षीण होने पर उनके जीव ने वहां से चलकर रत्नपुर नगर के राजा भानु की महारानी सुव्रता की पवित्र कुक्षि में अवतरण किया। महारानी को चौदह महास्वप्न आये। सबको विदित हो गया कि अपने यहां त्रैलोक्य के आराध्य, विश्व की महान् विभूति पैदा होने वाली है। महारानी सुव्रता विशेष सजगता से गर्भ का  पालन करने लगी ।
गर्भकाल पूरा होने पर माघ शुक्ला तृतीया के दिन मध्य रात्रि में प्रभु का प्रसव हुला। भगवान् के जन्म से मानव-मेदिनी में अपूर्व उत्साह छा गया। राजा भानु ने देवेन्द्रों द्वारा किये गये उत्सव के पश्चात् जन्मोत्सव प्रारम्भ किया। उस महान् उत्सव से दूर-दूर के लोगों को प्रभु के जन्म का पता लग गया।
नामकरण उत्सव में जनपद के अनगिनत लोग सम्मिलित हुए। राजकुमार को देखकर सभी चकित थे। राजा भानु ने कहा- राजकुमार जब गर्भ में था, तब इसकी माता को धार्मिक उपासना के अनेक दोहृद (इच्छाएं) उत्पन्न हुए थे, जिन्हें प्रयत्नपूर्वक पूरा किया गया था। अतः बालक का नामक धर्मकुमार रखा जाए। उपस्थित लोगों ने बालक को इसी नाम से पुकारा। उनके शरीर की ऊंचाई पैंतालीस धनुष्य की थी।
विवाह और राज्य
बाल्यावस्था क्रीड़ा में बिताने के बाद धर्मकुमार के शरीर में जब तारुण्य आया तो उनके अंग-अंग से तेज फूटने लगा सारा शरीर रश्मि पुंज जैसा प्रतिभासित होने लगा। राजा ने अपने कुल के अनुरूप सुयोग्य राजकन्याओं से राज-कुमार का पाणिग्रहण करवाया। समयान्तर से अवसर पाकर राजा भानु ने आग्रहपूर्वक धर्मकुमार को राज्य सौंपा और स्वयं अनिकेत-साधना के साधक बन गये ।
धर्मकुमार अब राजा धर्मनाथ बन चुके थे। वस्तुतः उनकी राज्य संचालन की व्यवस्था धर्मराज्य की व्यवस्था थी । लोगों में स्वार्थ की भावना लुप्त सी हो गई थी। सामूहिक जीवनपद्धति का उत्तम क्रम चलने लगा। राज्य में कोई दुःखी नहीं था, किसी एक के कष्ट को सब अपना मानते थे। लोगों में अर्थ का उन्माद नहीं था।
दीक्षा
मंगलमय राज्य-व्यवस्था चलाते हुए भ० धर्मनाथ ने चारित्र मोहनीय का क्षयोपशम समीप देखा। आपने राज्य-व्यवस्था का भार उत्तराधिकारी को दिया, और दायित्व से मुक्त होकर स्वयं ने वर्षीदान की परम्परा निभाई। आपके निवृत्त होने की बात सुनकर अनेक भव्य आत्माओं के हृदय बदल गये। वे भी अपनी पिछली व्यवस्था का दायित्व दूसरों को सौंपकर दीक्षा के लिए तैयार हो गए ।
निश्चित तिथि, माघ शुक्ला त्रयोदशी के दिन ‘नागदत्त’ नामक पालकी में बैठकर नगर से बाहर उपवन में आ गये। अपार मानवमेदिनी के मध्य पंचमुष्ठि लोच किया और एक हजार राजाओं के साथ सामायिक चारित्र ग्रहण किया। भगवान् के उस दिन बेले का तप था। दूसरे दिन सोमनस नगर के राजा धर्मसिंह के महलों में आपने परमान्न से पारणा
किया। यह आपकी प्रथम भिक्षा थी। इस अवसर पर देवों ने उत्सव किया, पंच द्रव्य प्रकट किये ।
केवल ज्ञान
दो वर्ष तक भगवान् धर्मनाथ अभिग्रह युक्त तप करते रहे। ध्यान की विविध प्रक्रियाओं के माध्यम से कर्म-निर्जरा करते हुए पुनः दीक्षा स्थल पर पधारे, तथा शतपर्ण वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बने, क्षपक श्रेणी तक पहुंच गये। भावों की प्रबलता से घातिक-कर्मों का क्षय कर आपने सर्वज्ञता प्राप्त की। देवों ने उत्सव करके अपने उल्लास को प्रकट किया तथा समवशरण की रचना की। हजारों लोगों की उपस्थिति में प्रभु ने पहला प्रवचन दिया। लौकिक और लोकोत्तर मार्ग को भिन्न-भिन्न बतलाकर लोकोत्तर पथ पर आने का आह्वान 
किया। अनेक व्यक्तियों ने आप से धर्म की उपासना ग्रहण की।
तेजस्वी धर्म-संघ
भगवान् धर्मनाथ के धर्मशासन में अनेक शक्तिशाली राजनयकों ने लोकसत्ता को छोड़कर आप द्वारा निरूपित आत्म-उपासना का मार्ग ग्रहण किया। धर्म संघ की आन्तरिक तेजस्विता साधकों की प्रबल साधना से स्फुरित होती है। बाहरी तेजस्विता तत्कालीन युग-नेता एवं सत्ताधीशों के धर्म के प्रति झुकाव से परिलक्षित होती है। जहां समुदाय है, वहां दोनों प्रकार की तेजस्विता अपेक्षित है। प्रारम्भिक साधना काल में निर्विघ्नता रहे, इसके लिए बाहरी तेजस्विता भी आवश्यक है। इतिहास साक्षी है, जब-जब धर्मशासन बाहरी तेजस्विता से हीन हुआ, तब-तब धर्म समुदाय पर संकट आए और धर्म-संघ छिन्न-भिन्न तक हो गये।
भगवान् धर्मनाथ के शासन काल में आन्तरिक तेजस्विता के साथ बाहरी वर्चस्व भी पर्याप्त रूप से बढ़ा हुआ था। हर क्षेत्र के लोग धर्म के प्रति आस्थावान बने हुये थे।
चार शलाका-पुरुष
पूरे अवसर्पिणीकाल में त्रेसठ महापुरुष होते हैं, उन्हें ‘शलाका-पुरुष’ कहा जाता है। त्रेसठ में एक तो धर्मनाथ प्रभु स्वयं थे। चार और शलाका पुरुष उनके शासन काल में हुये थे।
भगवान् के सर्वज्ञता प्राप्त करने से पहले प्रतिवासुदेव निसुंभ को मारकर वासुदेव पुरुषसिंह और उनके बड़े भाई बलदेव सुदर्शन क्रमशः पांचवे वासुदेव और बलदेव के रूप में पृथ्वी के उपभोक्ता बन गए थे। भगवान् सर्वज्ञ होने के बाद जब अश्वपुर पधारे तब दोनों भाईयों ने प्रभु के दर्शन किये तथा प्रवचन सुनकर भगवान् के परम भक्त बन गये। वासुदेव की मृत्यु के बाद बलदेव सुदर्शन ने भगवान् के पास संयम लेकर मोक्ष प्राप्त किया था।
प्रभु के शासन काल में दो चक्रवर्ती भी हुये थे। तीसरे श्री मघवा तथा चौथे श्री सनत्कुमार। सावत्थी नगरी के राजा समुद्रविजय के पुत्र मघवा का जन्म चौदह महास्वप्नों से हुआ था । क्रमशः उन्होंने जवानी में प्रवेश किया तभी आयुधशाला में चक्ररत्न पैदा हो गया। समस्त भरत क्षेत्र के एकछत्र चक्रवर्ती बने। सभी राजा उनके आज्ञानुवर्ती थे। इतने विशाल साम्राज्य को पाकर भी वे धर्म को एक क्षण के लिए भी नहीं भूले तथा सदैव लोगों को प्रेरणा देते रहे। चक्रवर्ती मघवा की भावना में एक बार उत्कर्ष आया और अपने उत्तराधिकारी को राज्य सौंपकर, भगवान् के उत्तरवर्ती आचार्य के पास दीक्षित होकर उन्होंने सद्गति प्राप्त की।
चौथे चक्रवर्ती सनत्कुमार भी आपके शासन काल में
हुये थे। हस्तिनापुर के राजा अश्वसेन पिता थे। माता का नाम महारानी सहदेवी था। बचपन में ही आप विभिन्न कलाओं में निपुण थे। फिर भी उपाध्याय की साक्षी से बहत्तर लौकिक कलाओं का ज्ञान किया ।
एक बार राजा के यहां एक अश्व-व्यापारी सुशिक्षित घोड़े लेकर आया। युवराज सनत्कुमार एक अश्व पर बैठकर अश्व-परीक्षा के लिए घूमने गये। ज्योंही घोड़ा शहर से 
निकला कि हवा-वेग से दौड़ने लगा, और कुछ ही क्षणों में राजकुमार सहित अदृश्य हो गया। राजा अश्वसेन अत्यधिक चिन्तित होकर कुमार की खोज करने लगे। जंगल में अन्धड़ के कारण अश्व के पद-चिन्ह भी लुप्त हो गये थे।
सनत्कुमार के मित्र महेन्द्रसिह ने राजा अश्वसेन को ज्यो-त्यों समझाकर वापिस भेजा तथा स्वयं कुमार को खोज
निकालने की प्रतिज्ञा करके आगे बढ़ा। कई प्रदेशों में घूमता हुआ वह काफी आगे तक निकल गया, पर कुंवर का कोई पता नहीं लग सका। फिरते-फिरते एक वर्ष बीत गया। एक बार महेन्द्रसिंह अपने मित्र को खोजता हुआ एक घने जंगल में जा रहा था। सहसा उसके कानों में हंस, मयूर, सारस आदि पक्षियों की मधुर आवाजें आने लगीं। महेन्द्रसिंह उधर ही
चल पड़ा। कुछ दूर चलने पर उसे एक सुन्दर उपवन नजर आया। उपवन के लताकुंज में उसे नवोढ़ा रमणियों से घिरा हुआ एक युवक नजर आया। निकट पहुंचते ही दोनों ने एक-दूसरे को पहुंचाना, वे आलिंगनबद्ध होकर परस्पर मिले। महेन्द्रसिह के पूछने पर सनत्कुमार ने कहा- मेरे लुप्त होने की गाथा मुझसे नहीं, इस विद्याधर कन्या वकुलमती से सुनो।
परम सुन्दरी बकुलमती ने सारा वृत्तान्त सुनाया। राक्षस को पराजित करने की घटना से महेन्द्रकुमार अत्यधिक प्रसन हुआ। अपने बाल सखा को माता-पिता की याद दिलाई और चलने का आग्रह किया। सनत्कुमार विद्याधर-कन्याओं को लेकर अपने मित्र महेन्द्र के साथ अपनी नगरी में बाया। राजा अश्वसेन ने सपरिवार सम्मुख पाकर पुत्र की अगवानी की। उसके महान् कार्यों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। राजा ने सहर्ष उसका राज्याभिषेक कर दिया ।
राजा बनने के कुछ समय पश्चात् सनत्कुमार की आयुध-शाला में चक्ररत्न पैदा हुआ। अनेक देश विजित कर सनत्कुमार एक सार्वभौम चक्रवर्ती बन गया।
शरीर को नश्वरता
प्रौढ़ावस्था में भी सनत्कुमार के शरीर के सौन्दर्य में कोई परिवर्तन नहीं आया था। एक बार शक्रेन्द्र महाराज में उनके सौन्दर्य की प्रशंसा की। दो देवता उनका रूप देखने के लिए मृत्यु-लोक में आये। वृद्ध-पुरुष का रूप बनाकर वे राज-महल में पहुंचे। आज्ञा पाकर अन्दर गये। चक्रवर्ती स्नान से पूर्व मालिश करवा रहे थे। देवगण उनको देखकर विस्मित हो उठे। चक्रवर्ती सनत्कुमार ने कहा- “अभी क्या देखा है,
सौन्दर्य हो देखना है तो दो घड़ी पश्चात् राज्य-सभा में उपस्थित होना। देवों ने कहा- जैसी आज्ञा । चार घड़ी पश्चात् देव राज्य सभा में पहुंचे। सनत्कुमार का रूप देखकर उन्होंने अपना सिर धुन लिया। किसी के पूछने पर कहा-“कीड़े पड़ गये हैं। महाराज के शरीर में, थूक कर देखिये।” चक्रवर्ती ने थूका। ध्यान से देखा तो सचमुच कीड़े नजर आये। चक्रवर्ती को शरीर की नश्वरता का भान हुआ । तत्काल उनका हृदय शारीरिक सौन्दर्य से विरक्त हो गया।
सनत्कुमार ने अपने उत्तराधिकारी को राज्य सौंपा तथा भगवान् धर्मनाथ के शासन में दीक्षित होकर उत्कृष्ट तपस्या करने लगे। कालान्तर में वे विविध लब्धियों के धारक बन गये। एक बार स्वर्ग में राजर्षि की पुनः प्रशंसा हुई। तभी उनकी वैदेह-भावना की परीक्षा करने के लिए एक देवता वैद्य का रूप बनाकर आया। लोग वैद्य को मुनि के पास लाये। वैद्य रूप में देव मुनि को देखकर बोला- मेरी दवाई लो, रोग मिट जाएगा। राजर्षि ने पूछा- “कौनसा रोग मिटाते हो ? द्रव्य या भाव ? द्रव्य रोग मिटाने की क्षमता तो मेरे पास भी है, भाव रोग मिटा सको तो बोलो ?” यों कहते हुए राजर्षि ने कुष्ट-ग्रस्त स्थान पर अपना थूक लगाया, कुछ ही क्षणों में रोग शान्त हो गया, वहां चमड़ी का रंग ही बदल गया ।
विस्मित देव ने मुनि के चरणों में सिर झुकाया तथा सारा किस्सा सुनाकर स्वर्ग में वापस प्रस्थान कर गया।
ये सब नर-रत्न महापुरुष भगवान् धर्मनाथ के शासन-काल में हुये। उनके कारण धार्मिक लोगों को भी अत्यधिक अनुकूलता बनी रही थी।
प्रभु का परिवार
गणधर-तयालीस(अरिष्ट मुनि आदि)
केवल ज्ञानी ,-चार हजार पांच सो
मनःपर्यवज्ञानी-ज्ञानी -चार हजार पांच सौ
अवधि ज्ञानी-तीन हजार छः सो
चतुर्दश पूर्वी- नौ सो
वैक्रिय लब्धि धारी -सात हजार
चर्चावादी-दो हजार आठ सो
साधू-चौंसठ हजार
साध्वी-बासठ हजार चार सौ (प्रवर्तिनी आर्या शिवा)
श्रावक-दो लाख चवालीस हजार
श्राविका-चार लाख तेरह हजार
निर्वाण
गंधहस्ति की भांति अप्रतिहत विचरते हुए भगवान् सम्मेद शिखर पर पधारे। अपना निर्वाण सन्निकट देखकर आपनै आठ सौ मुनियों के साथ अनशन ग्रहण किया तथा एक मास के अनशन में ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन सिद्धत्व को प्राप्त किया।
पांच कल्यानक तिथियां-
१. च्यवन-वैशाख शुक्ला ७
२. जन्म-माघ शुक्ला ३
३. दीक्षा-माघ शुक्ला १३
४. कैवल्य प्राप्ति-पौष कृष्णा १५
५. निर्वाण-ज्येष्ठ शुक्ला ५
६.केवल्य वृक्ष -Flame of the forest
७ प्रतीक,,,-वर्ॹ

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