भगवान् श्री शांतिनाथ
तोर्थङ्कर गोत्र का बन्ध
भगवान् शांतिनाथ ने तीर्थंकर गोत्र का बंध पिछले जन्म में ही कर लिया था। पूर्व जन्म में श्रीसेन, वज्रायुध, मेघरथ आदि के रूप में उन्होंने विशेष ख्याति अर्जित की थी। धार्मिक निष्ठा का विशेष परिचय दिया था। देवों ने उनकी कई बार परीक्षा की, किन्तु वे सदैव सफल ही रहे।
एक बार ईशानेन्द्र ने राजा मेघरथ की भूरि-भरि प्रशंसा की। उन्होंने देव सभा को बतलाया- पूंडरीक नगर के पराक्रमी राजा मेघरथ की विरक्ति विस्मयकारक है। अभी वे अट्ठम तप के साथ पौषध कर रहे हैं। मानवी ललनाएं तो क्या सुरांगनाएं भी उन्हें विचलित नहीं कर सकतीं।
ईशानेन्द्र की घोषणा से कुछ सुरांगनाओं ने विस्मित होकर मेघरथ को विचलित करने की मन में ठानी। पौषध-शाला में मेघरथ के पास आकर उन्होंने वसन्त ऋतु की विकु-र्वणा की। विस्तृत भोग-सामग्री व मादक वातावरण में उन्मत्त सुरवालाओं ने उत्तेजना बढ़ाते हुए मेघरथ से रति क्रीड़ा की प्रार्थना की। किन्तु मेघरथ ने उनके सामने देखा
तक नहीं, वे अपनी उपासना में लीन बने रहे। तीन दिन के परिश्रम के बाद भी देवांगनाओं को सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अपना परिचय दिया तथा अविचल बने रहने के लिए बधाई दी।
प्रातःकाल राज्य छोड़कर मेघरथ अपने पिता राजर्षि घनरथ के पास दीक्षित हुए। विरक्ति तो उनमें पहले ही थी, अब वे आत्मा के प्रति विशेष जागरूक बन गये। कर्मों की महान् निर्जरा करके उन्होंने तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। अन्त में अनशन पूर्वक शरीर छोड़ कर सर्वार्थ सिद्ध विमान में उत्पन्न हुए ।
जन्म
तैतीस सागरोपम का सर्वोत्कृष्ट देवायु भोगकर वे इसी
भरत क्षेत्र की हस्तिनापुर नगरी के नरेश विश्वसेन के राज-महल में महारानी अचिरा देवी की कुक्षि में अवतरित हुए। महारानी को आए चौदह महास्वप्नों से सबको ज्ञात हो गया कि महापुरुष जगत-प्राण प्रकट होने वाले हैं।
गर्भ काल पूरा होने पर ज्येष्ठ कृष्णा त्रयोदशी की मध्य-रात्रि में भगवान् का जन्म हुआ। उस समय चौदह रज्ज्वा त्मक लोक में अपूर्व शान्ति फैल गई थी। प्रभु के जन्म के समय दिशाएं पुलकित व वातावरण में अपूर्व उल्लास था। इन्द्रों ने उत्सव किया, राजा विश्वसेन ने अत्यधिक प्रमुदित मन से पुत्र का जन्मोत्सव मनाया ।
नामकरण के दिन राजा विश्वसेन ने कहा हमारे राज्य में कुछ मास पूर्व भयंकर महामारी का प्रकोप था। सब लोग चिन्तित थे। महारानी अचिरा देवी भी रोग से आक्रान्त थी। बालक के गर्भ में आते ही रानी का रोग शान्त हो गया, धीरे-धीरे सारे देश से महामारी भी समाप्त हो गयी, अतः बालक का नाम शान्तिकुमार रखा जाए। सबने उसी नाम से नवजात शिशु को पुकारा। उनके शरीर की ऊंचाई चालीस धनुष्य की थी ।
विवाह और राज्य
संचित व निकाचित कर्मों को भोगना ही पड़ता है, उन्हें भोगे बिना अध्यात्म का पथ प्रशस्त नहीं होता। भले ही पुण्य की प्रकृतियां ही क्यों न हों, कर्मों को भोगना आवश्यक है।
शांतिकुमार तीर्थंकर बनेंगे, किन्तु इन्हें और भी कुछ बनना था। पुण्य प्रकृतियों को भोगना था। शैशव काल समाप्त होते ही राजा विश्वसेन ने आपकी शादी की। दायित्व के योग्य समझकर समयान्तर से राजा आपका राज्याभिषेक किया और स्वयं ने मुनि व्रत अंगीकार कर लिया।
शांतिनाथ के राजा बनने के बाद राज्य में अभूतपूर्व समृद्धि और शांति का साम्राज्य छा गया था। कई वर्षों के बाद आयुध शाला में चक्र रत्त्न उत्पन्न हुआ। इधर पुत्र-रत्न की प्राप्ति भी हुई, पुत्र का नाम चक्रायुध रखा गया अनेक देश साधने के बाद वे सर्वे-शक्ति-सम्पन्न चक्रवर्ती बन गये
दीक्षा
भोगावली कर्मों का अन्त निकट समझ कर आपने आने राज्य की सुव्यवस्था करके वर्षी दान दिया। निर्णीत तिथि ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी के दिन सहस्राम्र उद्यान में एक हजार दीक्षार्थी पुरुषों के साथ आपने दीक्षा स्वोकार की। भगवान के उस दिन बेले का तप था। दूसरे दिन मन्दिरपुर नगर के राजा सुमित्र के राजमहल में परमान्न से आपने बेले का पारणा किया। देवों ने उत्सव किया। दान का महत्व सबको बतलाया ।
भगवान् एक वर्ष तक छद्मस्थ साधना करते रहे। अभिग्रह युक्त तप, आसन युक्त ध्यान से विशेष कर्म निर्जरा करते हुए पुनः एक वर्ष बाद उसी सहस्राम्र वन में पधारे। वहीं पर शुक्ल ध्यान में लीन होकर आपने क्षपक श्रेणी प्राप्त की। घातिक कर्मों को क्षीण किया और सर्वज्ञता प्राप्त की।
देवों ने प्रभु का केवल-महोत्सव किया। समवसरण को रचना की। देव तथा मनुष्यों की अपार भीड़ में प्रभु ने प्रथम प्रवचन दिया । प्रवचन से प्रभावित होकर अनेक व्यक्तियों ने आगार व अणगार धर्म को स्वीकार किया।
प्रभु का परिवार
गणधर- बत्तीस (चक्रायुध आदि)
केवल ज्ञानी -चार हजार तीन सौ
मनःपयंव ज्ञानी -चौदह हजार
अबधि ज्ञानी-तीन हजार
चतुर्दश पूर्वी-आठ सौ
बैंक्रिय लब्धि -धारी-छः हजार
चर्चा वादी-दो हजार चार सौ
साधु -बासठ हजार
साध्वियां-इकसठ हजार छः सौ (प्रवर्तिनी शुचिदेवी)
श्रावक -दो लाख निब्बे हजार
श्राविकाएं-तीन लाख तिरानवे हजार
निर्वाण
जीवन के अन्त में आयुष्य को क्षीण हुआ देखकर प्रभु ने अन्तिम अनशन किया तथा एक मास के अनशन में जेठ कृष्णा त्रयोदशी के दिन भव-विपाकी कर्मों को क्षय कर सिद्धत्व को प्राप्त किया । निर्वाणोत्सव पर अनगिनत मनुष्यों के अलावा चौसठ इन्द्र व देवगण उत्साह से सम्मिलित हुए । आपका सर्वायु एक लाख वर्ष का था ।
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन- भाद्रपद कृष्णा ७
२जन्म-ज्येष्ठ कृष्णा १३
३. दीक्षा-ज्येष्ठ कृष्णा १४
४. कैवल्य प्राप्ति-पौष शुक्ला ९
५. निर्वाण – ज्येष्ठ कृष्णा १३
६केवल्य वृक्ष- crepe jasmine
७प्रतीक 🦌 Deer
(तीर्थंकर चरित्र से साभार)
