भगवान् श्री अरनाथ
तीर्थङ्कर गोत्र का बंध
भगवान् श्री अरनाथ का जीव पूर्व-विदेह क्षेत्र की सुसीमा नगरी के नरेश धनपति के रूप में था। उस भव में उन्होंने विशेष धर्म की साधना की। राज्य भी किया, किन्तु सहज बन कर। लोगों को इतना नीति-निष्ठ बनाया कि कभी दण्ड देने की अपेक्षा भी नहीं हुई ।
अन्त में राजा धनपति ने विरक्त होकर संवरमुनि के पास संयम ग्रहण किया । अभिग्रह, ध्यान तथा स्वाध्याय की विशेष साधना करते हुए आर्य जनपद में निरपेक्ष भाव से विचरते रहे। एक बार आपके चतुर्मासी तप का पारणा जिनदास के यहां हुआ। देवों ने ‘अहोदानं’ की ध्वनि से दानदाता व मुनि की भारी महिमा फैलायी। मुनि फिर भी निरपेक्ष रहे, अहंकार लेश मात्र भी मुनि को नहीं छू पाया। इस प्रकार उच्चतम साधना से महान् कर्म-निर्जरा कर तीर्थङ्कर गोत्र का बंध किया। अन्त में आराधक पद पाकर आप ग्रैवेयक में महधिक देव बने ।
जन्म
देवत्व का पूर्ण आयुष्य भोग कर भगवान् हस्तिनापुर नगर के राजा सुदर्शन के राजप्रसाद में आये। वे रानी महादेवी की कुक्षि में उत्पन्न हुए। रानी महादेवी ने चौदह स्वप्न देखे । प्रातः नगर के घर-घर में महारानी के स्वप्नों तथा उनके फलों की चर्चा होने लगी ।
गर्भ-काल पूरा होने पर मृगसर शुक्ला दशमी की मध्य रात्रि में परम आनन्दमय बेला में प्रभु का प्रसव हुआ । देवेन्द्रों के उत्सव के बाद महाराज सुदर्शन ने समुल्लसित भाव से जन्मोत्सव किया ।
नाम के दिन विराट आयोजन में महाराज सुदर्शन ने बताया- यह बालक जब गर्भ में था, तब इसकी माता ने रत्न मय अर चक्र (अर) देखा था, अतः बालक का नाम अरकुमार रखा जाये। उनके शरीर की अवगाहना तीस धनुष्य की थी।
विवाह और राज्य
बाल लीला करते हुए बालक अरकुमार ने जब तारुण्य में प्रवेश किया तो राजा सुदर्शन ने सर्वाङ्ग सुन्दर अनेक राज-कन्याओं से उनकी शादी को। त्रिज्ञान धारी भगवान् अरनाथ ने अभी भोगावली कर्मों को शेष मान कर विवाह से इन्कार नहीं किया।
पुत्र को योग्य समझ कर पिता ने राज्य सौंपा तथा स्वयं ने स्थविर मुनि के पास साधुत्व ग्रहण किया। अरनाथ कुछ वर्षों तक मांडलिक राजा रहे, फिर चक्र रत्न उत्पन्न होने पर सार्व भौम चक्रवर्ती कहलाये । बत्तीस हजार राजा चक्रवर्ती अरनाथ की सेवा में अपने को कृतार्थ मानते थे।
दीक्षा
लम्बे समय तक चक्रवर्ती पद भोग कर चारित्रमोहनीय का क्षयोपशम होने पर आप संयम के लिये उद्यत बने। अपने उत्तराधिकारी सुयोग्य पुत्र अरविन्द को राज्य सौंपा और वर्षीदान देकर संयम लेने की घोषणा की। आपके चारित्र ग्रहण करने की बात ने कइयों को आश्चर्य चकित कर दिया था, और अनेक विरक्त भी हो गये थे।
मृगसर शुक्ला एकादशी के दिन भगवान् सहस्राम्र वन में पधारे। विशाल जन समूह व अनगिनत देव-गणों के बीच एक हजार राजाओं के साथ आपने संयम ग्रहण किया तथा दूसरे दिन राजपुर नगर में अपराजित राजा के यहां परमान्न से पारणा किया ।
प्रभु के छद्मस्थ काल के बारे में कई मत हैं. कहीं-कहीं दीक्षा के बाद तीन वर्ष छद्मस्थ काल के माने हैं। और कई जगह मात्र तीन अहोरात्री छद्यस्थ काल की मानी गयी हैं। भगवान् की केवल-महिमा देवेन्द्रों ने दूर-दूर तक फैलायी। प्रथम समवशरण में ही बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हो गये थे, तथा प्रथम प्रवचन में ही तीर्थ स्थापना हो चुकी थी। अनेक व्यक्ति श्रमणत्व व श्रावकत्व की दीक्षा ले चुके थे। पहले चक्रवर्ती होने के नाते जनपद में आपका अमिट प्रभाव था। अतिशय युक्त सर्वज्ञता होने से आप सबकी आस्था के केन्द्र बन चुके थे ।
प्रभु का परिवार
गणधर तेतीस (कुम्भमुनि आदि)
– केवलज्ञानी- दो हजार आठ सौ
मनः पर्यवज्ञानी -दो हजार पांच सौ इक्यावन
अवधि ज्ञानी – दो हजार छ सौ
चतुर्दश पूर्वी -छ सौ दस
वैक्रिय लब्धिधारी – सात हजार तीन सौ
चर्चा वादी- एक हज्जार छ सौ
साधु- पचास हजार
साध्वियां- साठ हजार (प्रवतिनी रक्षिता देवी)
श्रावक- दो लाख बहत्तर हजार
श्राविकाएं- तीन लाख बहत्तर हजार
निर्वाण
अघाती कर्मों का अन्त निकट देखकर भगवान् ने एक हजार मुनियों के साथ सम्मेदशिखर पर अनशन किया। मृगसर शुक्ला दशमी के दिन शुक्ल ध्यान के चौथे चरण में पहुंच कर आपने योग मात्र का निरोध कर दिया। शैलेशी अवस्था में अवशिष्ट समस्त प्रकृतियों को क्षय करके सिद्धत्व प्राप्त किया। आपका सर्वायुष्य चौरासी हजार वर्ष का था।
पांच कल्यानक तिथियां
१. च्यवन- फाल्गुन शुक्ला २
२. जन्म-मृगसर शुक्ला १०
३. दीक्षा-मृगसर शुक्ला ११
४. कैवल्य प्राप्ति-कार्तिक शुक्ला १२
५. निर्वाण मृगसर शुक्ला १०
६केवल्य वृक्ष- आम
७। प्रतीक – नन्दाव्रत

