भगवान् श्री मुनिसुव्रत
तीर्थंकर गोत्र का बंध
भगवान् मुनिसुव्रत के जीव ने पश्चिम-महाविदेह में चम्पा नरेश सुरश्रेष्ठ के जन्म में उत्कृष्ठ कोटि की साधना की थी। प्राप्त सत्ता को ठुकरा कर आपने मुनि-व्रत को ग्रहण किया । विभिन्न अनुष्ठानों से आर्हत्-धर्म की प्रभावना की। महान् कर्म-निर्जरा कर उन्होंने तीर्थङ्कर गोत्र का बंध किया तथा पण्डितमरण पाकर प्राणत स्वर्ग में महर्धिक देव बने ।
जन्म
अतुलनीय स्वर्गीय सुखों को भोगकर भव-समाप्ति के बाद भरत क्षेत्र की राजगृही नगरी के राजा सुमित्र के राज प्रासाद में आप महारानी प्रभावती की कोख में अवतरित हुए। बालक की महानता स्वप्नों से ज्ञात हो चुकी थी। ऐसे बालक के गर्भ में आने से सभी प्रसन्न थे।
गर्भ काल पूरा होने पर ज्येष्ठ कृष्णा नवमी की मध्य-रात्रि में बिना किसी पीड़ा के पुत्र का प्रसव हुआ । छप्पन दिग्कुमारियों ने जन्मोत्सव की व्यवस्था की। उन्होंने प्रभु के जन्म का उत्सव किया। चौसठ इंद्र अपार देवता इकट्ठे हुए ।
नाम के दिन समागत सम्मानित नागरिक व पारिवारिक बुजुर्गों से राजा ने कहा-बालक के गर्भ काल में माता का मन व्रत पालन में बड़ा रहा। कभी किसी में त्रुटि नहीं जाने दी। अतः बालक का नाम मूनि सुव्रत रखा जाए।बाल लीला के बाद जब तारूण्य में प्रवेश किया तब राजा सुमित्र ने सुयोग्य व समवयस्क राजकन्याओं के साथ कुंवर का पाणिग्रहण करवाया तथा कुछ वर्षों के बाद उन्हें राज्य सौंप कर स्वयं निवृत्त हो गये।
भगवान् मुनिसुव्रत ने राज्य का संचालन उत्तम रीति से किया। लोगों को मर्यादानिष्ठ बनाकर अनेक समस्याओं को समाप्त कर दिया। आपके राज्य काल में लोग स्वतः व्यवस्था का पालन करते थे । अव्यवस्था पूर्णतः समाप्त हो चुकी थी।
दीक्षा
गृहस्थोपभोग्य कर्मों के क्षय होने से आपने अपने उत्तरा-धिकारी को राज्य देकर वर्षीदान दिया। फाल्गुन कृष्णा अष्टमी के दिन एक हजार विरक्त भव्यात्माओं के साथ संयम ग्रहण किया। आपके दीक्षा समारोह पर मनुष्यों के साथ देवों की भी अपार भीड़ थी।
ग्यारह मास तक आपने छद्यस्थ चारित्र का पालन किया विचरते-विचरते पुनः राजगृही के उद्यान में पधारे। वहीं पर चम्पक वृक्ष के नीचे आपने ध्यान में सर्वज्ञता प्राप्त की।
देव निर्मित समवसरण में प्रथम प्रवचन दिया। तीर्थ स्थापना के साथ बड़ी संख्या में साधु साध्वी, श्रावक तथा श्राविकाएं हो गई थीं। समग्र जनपद में धर्म की लहर दौड़ गई थी।
प्रभु का परिवार
गणधर -अठारह (मल्ली मुनि आदि)
केवल ज्ञानी – एक हजार आठ सौ
मनःपर्यवज्ञानी-एक हजार पांच सौ
चतुर्दश पूर्वी-पांच सौ
वैक्रिय लब्धिधारी-दो हजार
चर्चावादी -एक हजार दो सौ
साधु -तीस हजार
साध्वी -पचास हजार (प्रवर्तिनी पुष्पमती)
श्रावक – एक लाख बहत्तर हजार
श्राविका। तीन लाख पचास हजार ।
निर्वाण
निर्वाण बेला को निकट देखकर भगवान् ने एक हजार चरम शरीरी व्यक्तियों के साथ एक मास का अन्तिम अनशन किया । ज्येष्ठ कृष्णा नवमी के दिन समेद-शिखर पर भव विपाकी कर्मों को क्षय करके आपने निर्वाण को प्राप्त किया ।चौसठ इंद्रों ने मिलकर भगवान के शरीर की नीहरण क्रिया की।
आपका सर्वायुष्य तीस हजार वर्ष का था।
पांच कल्यानक तिथियां
१. च्यवन-श्रावण शुक्ला १५
२. जन्म-ज्येष्ठ कृष्णा ६
३. दीक्षा- फाल्गुन कृष्णा ८
४. कैवल्य प्राप्ति-फाल्गुन कृष्णा १२
५. निर्वाण-ज्येष्ठ कृष्णा ६
६.केवल्य वृक्ष -सुनहरा चम्पा पेड़
७.प्रतीक-कछुआ (Tortoise)
