ओ भटके हुए इंसान
(तर्ज: ऐ मेरे दिले नादान ….)
ओ भटके हुए इन्सान, प्रभु शरण चले आना।
हो जाए सफल जीवन, घबराये क्यों दीवाना ।।
दो दिन की जिन्दगी को, क्या यूँ ही गँवाएगा।
आयेगा काल सिर पर, नहीं कोई बचाएगा।
मतलब का जमाना है, तूने ये नहीं जाना।।
सुख और दुःख जीवन में, कर्मों का नजारा है।
धोखे में न पड़ गाफिल, बस एक सहारा है।
सुलझेगी तेरी उलझन, धीरज को न विसराना ।।
अन्याय कपट कर क्यों, अपने को लुटाता है।
जिस डाल पे बैठा है, उसको ही मिटाता है, कहे वीर मण्डल पगले, पीछे नहीं पछताना ।।
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तोरा मन दर्पण कहलाये
तोरा मन दर्पण कहलाये, भले-बुरे कर्मों को, देखे और दिखाए। तोरा मन………
मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय। मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय। इस उजले दर्पण पर प्राणी, धूल न जमने पाए।। तोरा मन
सुख की कलियाँ दुःख के काटे, मन सबका आधार ।
मन से काई बात छिपे ना, मन के नयन हजार। जग से कोई भाग ले चाहे, मन से भाग न पाए ।। तोरा मन…. तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल ।
तन के कारण मन के धन को, मत माटी में घोल।
मन की कदर भुलाने वाला, हीरा जनम गँवाए ।।
उठ जाग मुसाफिर भोर भयी
उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है
उठ नींद से अंखियां खोल जरा, ओ गाफिल प्रभु से ध्यान लगा यह प्रीत करन की रीत नहीं, सब जागत हैं तू सोवत है, उठ अन्जान भुगत करनी अपनी, ओ पापी पाप में चैन कहाँ जब पाप की गठरी शीश धरी, फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है जो काल करे सो आज कर ले, जो आज करे सो अब कर ले जब चिड़ियन खेत न चुगडारी, फिर पछताये क्या होवत है उठ जाग