ज्ञान का दीपक जलाते चलो
(तर्ज -जोत से जोत जगाते चलो)
ज्ञान के दीपक जगाते चलो, पर्व सुखों का मनाते चलो, धधकते जो क्रोध शोले उठे, समता के जल से जगाते चलो
मन मन्दिर में जाने लगे है, चंदन झाड ले लो, प्रेम की उजली चादर ले के, जीवन को चमका लो सबको गले से लगाते चलो
पर्व सुखों सब पर्वों में पर्व है प्यारा,
इसका न कोई सानी धर्म के रंग में पूर्ण रंग जा, क्यों तू करे मनमानी सत्य का नाद बजाते चलो पर्व सुखों का मनाते चलो,
दया धर्म की सुन्दर सरिता में, तुम गोते लगा लो, चारों तीर्थ पास तुम्हारे, कुछ तो लाभ उठा लो
जीवन सुमन महकाते चलो, असली-नकली क्या है तेरा पर्व सुखों का मनाते चलो,
अपना स्वरूप तो देखो, पर्व सुखों का कहता अपना मन मन्दिर तो देखो “सरल” वीर गुण गाते चलो पर्व सुखों का मनाते चलो
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ज्योति से ज्योत जगाते चलो
ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो राह में आये जो दीन दुखी सबको गले से लगाते चलो, प्रेम जिसका न कोई संगी साथी, ईश्वर है रखवारा
जो निर्बल है, जो निर्धन है, वो है प्रभु का प्यारा
प्यार के मोती (2) लुटाते चलो,
प्रेम आशा टूटी, ममता रूठीं, छूट गया है किनारा बंद करो मत द्वार दया का, दे दो मुझको सहारा दीप दया का (2) जलाते चलो, प्रेम……….