जिंदगी अनमोल
लय : मेरा जीवन कोरा कागज
जिंदगी अनमोल है यह, क्यों तूं खो रहा है यही जगने की बेला, क्यों तूं सो रहा।
१. तुच्छ भौतिक आस में क्यों, हारता जीवन। मानता जिसको तू अपना, वह पराया धन।
है नहीं कुछ भी यहां तू, व्यर्थ रो रहा ॥
२. जाग निद्रा त्याग कर तू, पंथ को पहचान क्या किया ? क्या कर रहा ! कुछ, सोच रे मतिमान ! जीवन है दिन चार का, क्यों भार ढो रहा ॥
३. आज ही है हाथ में जो, करना है, कर ले। घट पड़ा क्यों रिक्त तेरा, शीघ्र तू भर ले।
प्राप्त होता फल वही, जैसा जो बो रहा ॥