Jara Soch Le Tu Man Me Syana

जरा सोचले तूं

(तर्ज – जरा सामने तो आओ )
रचयिता : मुनि बुद्धमल
जरा सोचले तूं मन में स्याणां, थारै जीवन रो के आधार है, झोलो बहज्या कठीनै पून रो, ईरी चंचलता रो के पार है ।।
१. झूठी है काया झूठी है माया, झूठो है जीवन रो खेलो झूठा है परिजन झूठा है सगपण, लाग्यो ज्यूं दो दिन से मेळो
 घेरो लागै जकै दिन मोत रो, सागै जावै नहीं एक तार है ।।१
२. इच्छा तो आकाश ज्यूं है अनंती, पण पदार्था री सीमा ईधन स्यूं धापै नहीं आग भोळा, तो फेर पग घर तूं धीमा रोक इच्छा रै बढ़ते वेग नै, ईच्छा-वर्धन ही तो संसार है ।।२।
३. समता स्यूं रहणो समता स्यूं सहणो, समता रो जीवन है साचो 
भावां में विष सी विषमता न घोलो, मनड़े नै मत करजे काचो “
बुद्ध”जीवन री बाजी जीतले, औ ही उत्तम थारा संस्कार है ।।३।
संकट निवारक मंत्र ॐ-अ-भी-रा-शि-को-नमः

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