भिक्षु स्तुति
.(लय : संयममय जीवन हो )
रचयिता : मुनि सुमेरमलजी, ‘लाडनूं’
भिक्षु भिक्षु भजन होभिक्षु-भिक्षु भजन हो।
तन से, मन से और वचन से प्रतिपल यही रटन हो।
भिक्षु-भिक्षु भजन हो ।।
१. जब-जब जाप किया श्रद्धा से, अयि गुरुदेव तुम्हारा, तब-तब नष्ट अरिष्ट हुए सब, दुःख से मिला किनारा ।
देव! तुम्हारे बतलाए मारग भर, सतत गमन हो ।।
२. जब जब पड़ी जरूरत तुमने, सबको दिया सहारा,
रहा न कोई कार्य शेष, गुरु जिसने तुम्हें पुकारा ।
मंत्र स्वयं है नाम तुम्हारा, यदि श्रद्धामय मन हो ।।
३. शिथिलाचार देखकर तेरा, हुआ हृदय विद्रोही,
सत्य राह पर चलने के हित, देव बने निर्मोही ।
सिद्धांतों पर बने अडिग हम, निष्ठा ही जीवन हो ।।
४. देव! तुम्हारा नाम हमारे, कण-कण में रम जाए,
शासन की गौरव वृद्धि में, नव इतिहास बनाएं । ‘
मुनि सुमेर’ दीपानंदन का, युग-युग अभिनंदन हो ।।