Mangal Geet Sunayenge, Varshitap Geet

(लय-यह भारत देश है)

रंग बिरंगी तप सुमनों से, सुरभित दशों दिशाएं। लो मंगल गीत सुनाएं।।
1. हर फूल खिला, हर कली खिली, वरसा वर्षीतप सावन, जुही चंपा और चमेली, बना गुलाब यह शतदल। भीनी भीनी सौरभ से, गाती है गीत हवाएं।
2. नन्दनवन के इस उपवन में, बहते तप के झरने, तप गंगा में स्नान करे, कल्याण स्वयं का करने। आनन्द की धारा में डुबकियां जी भर आज लगाएं
3. साधुवाद है तपसन को, वर्षीतप में शक्ति जगाई, तपः चेतना जागृत की उसे बारम्बार बधाई। भैक्षव शासन के गौरव को, शिखरों सदा चढ़ाए।।
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