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विमल प्रभु स्तवन
साहिब ! शरण तिहारै हो।
शरण तिहारै, शरण तिहारै, शरण तिहारै हो। विमल प्रभू! सेवक नीं अरदास, आयो शरण तिहारै हो ।
1. विमल करण प्रभु विमलनाथजी, विमल आप वर रीत। विमल ध्यान धरतां हुवै निर्मल, तन मन लागी प्रीत ॥
2. विमल ध्यान प्रभु आप ध्याया, तिण सूं हुवा विमल जगदीश। विमल ध्यान बलि जे कोई ध्यासी, होसी विमल सरीस ॥
3. विमल गृहवासे द्रव्य जिनेन्द्र था, दीख्या लीघां भावे साथ। केवल उपनां भावे जिनेश्वर, भावे विमल आराध ॥
4. नाम स्थापना द्रव्य विमल थी, कारज न सरै कोय। भाव विमल थी कारज सुधरै, भाव जप्यां शिव होय ॥
5. गुण गिरवो गंभीर धीर तूं, तूं मेटण जम-त्रास। मैं तुम वयण आगम शिर धार्या, तूं मुझ पूरण आश॥
6. तूं ही कृपाल दयाल साहिब! शिव-दायक तूं जगनाथ। निश्चल ध्यान धरै तुझ ओलख, ते मिले तुझ संघात ॥
2. अंतरजामी आप उजागर, मैं तुम शरणो लीध। संवत उगणीसै भाद्रवी पूनम, वंछित कारज सीध॥
लय: कांय न मांगां, कांय न मांगां, कांय न मांगां हो
चौबीसी 253