Ghana Suhao Mata Dipaji Ra Jaya

घणा सुहावो माता
घणां सुहावो माता दीपांजी रा जाया !
थांनै तो ध्यावै सारो राजस्थान हो, सारो हिन्दुस्तान हो, मानवता रा मान हो, जिन-शासन री शान हो, माता दीपांजी रा जाया ।।
१. शास्त्रां री गहराई में, अति गहराई स्यूं थे उतस्या,
 कांटां रै बीहड़ मारग में, निर्भयता स्यूं चरण धरया । 
हो स्वामी! कीन्हो धीरज धर अपणो अनुसंधान हो ।।
३. अंतिम आश्रय मानव रो, थांरो पहलो आवास हो, 
मृत्यु में ही जीवन रो, मानो गहरो आभास हो । 
हो स्वामी! पायो अमरत्व को नूतन विज्ञान हो ।।
२. एक रात री तीव्र ताव, चिन्तन की धारा मोड़ दी, रूढ़िवाद री सबल श्रृंखला, इक झटके स्यूं तोड़ दी । 
हो स्वामी! विरला जन कर पाया थांरी पहचान हो ।।
४. चीर कुहासो पलट्यो पासो, थांरी कल्याणी वाणी, पढ़तो-पढ़तो थकै न कोई, थारै जीवन री क्हाणी । 
हो स्वामी! दीपै दुनियां में तेरापंथ महान हो ।।
५. एक सूत्र में बांध्यो बाबो, साधां रै समुदाय नै, शिष-शाखा रो ममत मिटायो, एक-एक नै ताय नै । हो स्वामी ! बत्तीसै रो बो सारो संविधान हो ।।
६. धर्माधर्म विवेचन थांरो कानां री खिड़क्यां खोलै,
 बो साहित्य मारवाड़ी में सारां रै मूंडे बोलै । 
हो स्वामी! खुल्लै दिल संघर्षां में झोंकी ज्यान हो ।।
७. म्हे कासीद प्रभू रै घर रा, हळुकर्त्यां रै मनभावां,
 करां उघाड़ पोप-लीला रो, पाखंड्यां नै अणखावां । 
हो स्वामी! थांरा आदर्श वीर वर्धमान हो ।।
८. घणी मधुर घटनावां थांरी किसी-किसी नै याद करां, पावन नाम प्रभू रो नाच रह्यो है, जन-जन रै अधरां । 
हो स्वामी! थांरै पद-चिह्नां पर थांरी संतान हो ।।
९. ‘विश्व भारती’ रे प्रांगण में चरमोत्सव की रंगरळी, चौतीसै भाद्रव तेरस दिन ‘तुलसी’ खिलगी कळी-कळी । हो स्वामी ! भक्तां रै भावां में थे मूर्तिमान हो, 
हो स्वामी ! प्राणां री पुलकन हो, मन री मुसकान हो ।।
लयः खम्मा खम्मा हो …..
रचयिता : आचार्यश्री तुलसी

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top