यह जैन तीर्थंकरों और संतों की वंदना का भजन है — भक्ति और स्वाध्याय के लिए। A Jain devotional song honoring the Tirthankaras and saints.
कहै किशनोजी चाल-चाल भारीमाल, भीखणजी थारे कांई लागे
काढे आंख्यां लाल-लाल भारीमाल ,भीखणजी थारे कांई लागे
खींच बावड़ियो झाल चाल भारीमल ,भीखणजी थारे कांई लागे
अट्ठारै सै चोकै मंगल आखातीज जलम थांरोपांच बरस रो छोड़ मरी थारी मां दूजो कुण साहरो
कितो दोरो पालर मोटो करयो जीव जाणे म्हारो
तूं भावी री ढाल नाव री हाल भीखणजी थारे कांई लागै
मनै न राखे स्वामीजी तो म्है भी तनै कियां छोडूं
बुढापे रो स्हारो लकड़ी तोड़ भला क्यूं दुःख ओढु
एक घाव दो टूक बात है लोढ़ेड़े ने के लोढू झूठो जिद मत झाल लाल, खुशहाल भीखणजी थारै कांई लागे
सोरो घणो राख स्यूं रे नान्हा तनै अहल नहिं आवण दयूं तावड़िये में दूर गोचरी पाणी तनै नहिं जावण दयूं
इसो बिसो अणगम्यो उतरतो तनै कदै नहिं खावणदयूं म्हारों साहमो न्हाल छोड़ पंपाल भीखणजी थारें कांई लागे
बोले भारीमाल अजी मोटा पुरुषां मन समझाओ
छोड़ दियों संसार बाप बेटा रो अबै किसो दाओ
थारे हाथ से अन्न जल ल्यूं तो, त्याग मनै मत ले जावो सुणतां उठ्यो उबाल भीम भूचाल भीखणजी थारे कांई लागे
धौसर लेग्या ऊंचो नीचो लैर मनावै समझावे
बेटो मून न खोले पाणी पीवे नहीं रोटी खावे
दो दिन बीत्या बणया निपीत्या जीव बापरो अकुलावै हाल बेहाल गली न दाल विकराल भीखणजी थांरे कांई लागे
अंत हार मन मार ल्यार पाछा सूंप्या ल्यो स्वामीजी
ओ तो राजी आं चरणा स्यूं आहार ल्यार यो स्वामीजी म्हारो भी तो ठोड़ ठिकाणों कठई जमा द्यो
स्वामीजी दीन दयाल कृपाल भाल सुविशाल भीखणजी थांरे कांई लागै
जयमलजी म्हारासा नै ल्या किशनोजी नै संभलावे
सागर तीनूं घर वधावणां बुद्धि भीखणरी सै गावै
जम्यो ठिकाणो चेलो मिलग्यो टल्योओ गालो हरषावे करयो कमाल बवाल टाल रिक्षपाल भीखणजी थारे कांई लागै