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कुन्थु प्रभु स्तवन
प्रभु को समरण कर नीको रे।
1. कुन्थु जिनेश्वर करुणा-सागर, त्रिभूवन सिर टीको रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
2. अद्भुत रूप अनूप कुन्थु जिन, दर्शन जग-पी को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
3. वाण सुधा सम उपशम रस नीं, वाल्हौ जगती को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
4. अनुकंपा दोय श्री जिन दाखी, मर्म समदृष्टी को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
5. असंजती रो जीवणो बांछे, सावद्य तहतीको रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
6. निरवद्य करुणा करि जन ताऱ्या, धर्म ए जिनजी को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
7. संवत उगणीसे आसू बिद एकम, शरणो साहिबजी को रे। प्रभु को समरण कर नीको रे॥
: भिक्षु म्हारे प्रगट्या जी भरत खेतर में