Jyoti Charan Abhyarthana

ज्योतिचरण अभ्यर्थना

चरण शरण गुरु महाश्रमण की, झंकृत मन तंत्री के तार ।
श्रद्धा सुमनों से आपूरित, झेलो भक्ति भरा उपहार ।।
विहस उठी थी दशो दिशाएं, पाकर झूमर कुल नंदन ।
मंगल गीतों से अभिगुंजित, माँ नेमा का घर आंगन ।
मोहनगारी मूरत तेरी, बन गई जन जन प्राणाधार ।।1।।
सरदारशहर की पुण्यधरा पर, जन्म हुआ शुभ प्रभुवर का ।
दिव्य देह आंचल में लखकर, हर्षित कण कण भू अम्बर का ।
विकसित सारे कमल हो गए, देख रवि- सा दिव्य दिदार ।।2।।
सन्निधि पाकर मुनि सुमेर की, जाग उठा भीतर साहस ।
चरण बढ़े संयम के पथ पर सफल हुआ मुनिवर पावस ।
अक्षजयी बन मुनि मुदित ने, संयम लक्ष्य किया साकार ।।3।।
गुरु तुलसी की दिव्य दृष्टि ने, कोहिनूर लिया था खोज ।
दिया प्रशिक्षण बहुविध बहुतर, भरा शिष्य में अनुपम ओज ।
महाप्रज्ञ गुरुवर ने गुरुदृष्टि को दिया नया आकार ।।4।।
शोभित तुमसे तेरापंथ का, एकादशमा शुभ आसन ।
करुणा वत्सलता से पूरित, करते हैं प्रभुवर शासन ।
अमियपगी दृष्टि को पाकर खुले प्रगति के अभिनव द्वार ।।5।।
(तर्ज – कलियुग बैठा मार कुंडली…)

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