श्री महाश्रमण चालीसा
रचनाकार-मुनि श्री कमल कुमार जी
।। दोहा ।।
महिमा गुरू महाश्रमण की, फैल रही चहुं ओर।
भूतल में उतरी नई, स्वर्ण सुहानी भोर ।।।।।
महाप्रज्ञ वर से मिला, तेरापथ का ताज।
महाश्रमण जुग जुग तपो, अंतर की आवाज ।।2।।
चालीसा का पाठ नित, करें सुबह या शाम।
नियमित दिनचर्या बने, मन पर रहे लगाम ।।३ ।।
।। चौपाई ।।
जय जय महाश्रमण गुरू प्यारे, चार तीर्थ के नयन सितारे-1
माँ नेमां ने जन्म दिया है, गुरू चरणों उपहार किया है-2
झूमरमल जी पिता सुहाये, दुग्गड़ कुल के भाग्य जगाये-3
जन्मभूमि सरदारशहर है, जयाचार्य से सदा महर है-4
गुरू तुलसी की महर नजर में, दीक्षा ली सरदारशहर में-5
मुनि सुमेर से संयम पाया, मानो सुरमणि कर में आया-6
ज्ञान, ध्यान, स्वाध्याय निरंतर, जगमग जगमग बाह्याभ्यन्तर – 7
ज्ञाता, द्रष्टा, भाव विशुद्धि, बढ़ती रही मोक्ष की बुद्धि-8
गुरू इंगित आराधन पल-पल, जीवन गंगाजल सा निर्मल-9
मितभोजी मितभाषी गुरूवर, उपशम अमृत बांटे दिनभर-10
अप्रमत्त चर्या वरदायी, सबके लिए प्रेरणादायी – 11
विमल विवेक अमल आचारी, महिमा गाते हैं नर नारी-12
गण निष्ठा देखी बचपन में, आस्था जागी है जन-जन में-13
दिल्ली में इतिहास रचाया, गुरू के दिल में स्थान जमाया-14
साझपति-पद ब्यावर पाया, तुलसी गुरू मन हर्ष सवाया-15
चन्देरी में महाश्रमण पद, दर्शक जन का मानस गद्गद् – 16
महाप्रज्ञ की महिमा न्यारी, बना दिया निज पट अधिकारी-17
गंगाशहर धरा का गौरव, हुआ जहां युवराज महोत्सव-18
गगन धरा दिग् गूंजे नारे, महाश्रमण भावी रखवारे-19
महाप्रज्ञ जब स्वर्ग सिधाये, एकादशम नाथ कहलाये-20
पट्टोत्सव का सीन निराला, नयनों में भर गया उजाला-21
गांधीविद्या मंदिर प्रांगण, जन मन हर्षित पुलकित कण कण-22
पद पा किंचित गर्व न आया, विनय रूप दरिया लहराया 23
सुस्थित बन कर्तव्य निभाया, पत्ता भी हिलने ना पाया-24
स्नेह-नीर से गण तरू सींचा स्खिला खूब यह संघ बगीचा-25
सहज सरल है कोमल वाणी, सुनकर भवजल तरते प्राणी-26
अनुकम्पा की लहर चली है, मानवता की पौध फली है-27
यात्रा की शुरूआत शुभंकर, सुयश पताका चढ़े शिखर पर-28
नगर केलवा का चौमासा, जागृत की सब में नव आशा-29
भैक्षव गण का उद्गमस्थल है, गुरू का चिंतन सदा सफल है-30
बड़े भाग्य से गुरू घर आये, चरण शरण मंजिल पहुंचाए-31
पावन चितंन पावन जीवन, बोल रहे हैं सारे धन धन-32
आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा, लगता सबको सबसे प्यारा-33
गुरूः बिन पार लगे ना नैया, सही समझना इसको भैया-34
गुरू की महर नजर हो जाए, उजड़ी बगिया फिर सरसाये-35
भैक्षव शासन है सौभागी, महाश्रमण पा किस्मत जागी-36
गुरु दुष्टि जो शीश चढ़ाता, पल में बिन्दु सिंधु बन जाता-37
जिस पर रहता गुरू का साया, नर भव पाकर सब कुछ पाया-38
शम सम श्रम का बो आलंबन, जीवन में भरलें संजीवन-39
चालीसा जो दिल से गाये, रोग शोक दुख निकट न आये-40
।। आरती ।।
जय महाश्रमण गुरुराज ।
करते शत्-शत् वंदन, खुशियां वे अन्दाज ।। टेक।
झुमर कुल उजियारे, जन-जन के प्यारे।
मां नेमां के नन्दन, स्वच्छ सरल निर्व्याज ।।।।
मुनि सुमेर चन्देरी, से पाई दीक्षा।
तुलसी गुरू की कृति पर, जन-जन को है नाज।।2।।महाप्रज्ञ की दृष्टि, रची है शुभ सृष्टि।
योग्य चयन को पाकर, पुलकित सकल समाज ।।3।।
दिग् दिगंत में महिमा, फैली है भारी।
युग-युग तपो धरा पर, है अन्तर आवाज 11411
अनुकम्पा के आगर, सद्गुरू के सागर।
अनुपम और विलक्षण, कमल संघ सरताज 11511