ऋषभ तेरे चरणों में, कोटि वन्दना हमारी है। श्रद्धा के दीप लेकर, करते आरती तुम्हारी हैं।
१. नाभि के दुलारे हो, मरुदेवा के सुत प्यारे। तुमसे ज्ञान मिला सबको, प्रभुवर उपकारी हैं ॥
२. तुमने युग प्रवर्तन कर, ले ली थी श्रमण दीक्षा। भिक्षा नहीं मिली आपको, चर्या कठिन तुम्हारी है ॥
३. जनता हाथी घोड़े लाती, हीरे पन्ने माणक मोती। बाबा को यह चाह नहीं, तप त्याग का पुजारी है ॥
४. पड़पोते श्रेयांस ने तुम्हें, मार्ग चलते जब देखा। ज्ञात हुई सारी घटना, विनति प्रभु ने स्वीकारी है ॥
५. वर्षीतप के पारणे की, बातें सुन भिक्षा की। विस्मित हुआ जन-जन का मन, छाई खुशियां भारी है ॥
(तर्ज : बाबुल का यह घर)