जीवन तो भैया एक रेल है कभी पेसेन्जर कभी मेल है -2
1.सुख -दुख की पटरी पर दौड़ लगाती है आगे मंजिल पर बढ़ती जाती है,हो हो हो सुख -दुख —-
सांसों का जब तक इसमें तेल है, कभी पेसेन्जर–
2.रिश्ते भी बनते और बिगड़ते हैं,यात्री जो चढ़ते और बिछड़ते हैं ,हो हो रिश्ते भी बनते और बिगड़ते हैं यात्री जो चढ़ते ——
गाड़ के सिग्नल का ये खेल है, कभी पेसेन्जर कभी मेल है