(तर्ज और रंग दे रे..)
घोर तपस्वी मुनि श्री सुखलालजी
घोर तपसी हो मुनि घोर तपसी, थारो नाम उठ-उठ जन भोर जपसीजी।
घोर तपसी हो ‘सुख’ घोर तपसी, थारो जाप जप्यां करमां ही कोड़ खपसी ।।
दो सौ बरसां ही भारी ख्यात है बणी, थांरो नाम मोटा तपस्यां रेसाथ फबसी।
ओअनशन आ सहज समता, लाखों लोगा रे दिलों में थांरी छाप छपसी ।।१।।
काया पर कुल्हाड़ी व्हाणी काम करड़ो, सोरी पाटा उपर बैठ करणी गपसपसी ।
तपस्या, आतापना, स्वाध्याय करणी, थांरी सेवा-भावना रे लारे सारा दबसी ।। २ ।।
स्वामीजी रो शासन तप संजम ही सुरसरी, इणमें नावसी जकां रो सारो पाप धुपसी।
आपणे शासण री संता, चढ़ती कला, इणमें घणा ही तप्या है और घणा तपसी ।। ३ ।।
शिखर चढ्यो है चढ़ता ही रहसी, गण रो शीश आभे पैर जा पाताल रूकसी/
इण स्यूं विमुख अवनीत जो हूसी, बारे भाग रो भानूडो जा छिती में छिपसी ।। ४ ।।
संजम जीवन जीवो, पण्डित मरण मरो, थारे दोनू ‘हाथां लाडू खावो खुशी रे खुशी।
लंबी लंबी यात्रा मंगल फागण बदी, ‘सुख’ साधना सुखदाई गाई गणी तुलसी ।। ५ ।।
दोहा
भद्रोत्तर तप ऊपरै, अनशन दिन इक्कीस।
घोर तपस्वी सुख मुनि, साधक विश्वाबीस ।।