तप स्यूं आतमा में भारी बळ आवै, कचरो करमा रो पल भर में जळ ज्यावै, कंचन वरणी होवै काया, रोग-दोख खनै आंतां ही घबरावै ॥ स्थायी ॥
कोरी बातां करणी सोरी, मन री तिषणा, तजणी दोरी, उर में ऊंदरा कूदै जद धीरज ढह ज्यावै-तप स्यूं…..॥1॥
इन्द्रयां चंचळ नाच नचावै, बड़ां – बड़ां रो रोब गमावै, बिरला हिम्मती मिनख ही संभळ पावै तप स्यूं…. ।॥2॥
मुश्किल है वश करणो मन नै, चाहीजै दिन भर ईं तन नै, भाणो देखतां ही लार टपक ज्यावै तप स्यूं…. ॥3॥
प्रगट हुवै केई लब्ध्यां मोटी, पिण पैली हुवै कड़ी कसौटी, खरो उतरै वो सोनो कहलावै तप स्यूं…. 14 ||
मोक्ष महल रो चोथो पथ है, भव-वन पार उतारण रथ है, ‘मधुकर’ तपस्या रा आगम भी गुण गावै-तप स्यूं…
(लय-स्वामी भीखण जी रो नाम)