Barase O Savniyo Rimjhim

बरसे सावणियो ओ रिमझिम

(तर्ज : म्हानें गंगा जी रो….)
बरसे सावणियो ओ रिमझिम, तप रो रंग बरसे पलछिन । भरल्यो इण रंग स्यूं थे थारी प्यारी जीवन गगरी । 
रंगल्यो सोहणी, मनमोहणी, तपस्या री चूनरी ।।
बेला, तेला, करो अठाई, जो थारे मन में आवै । 
पखवाड़ो और मासखमण तो, विरला कोई कर पावै । दर्शन, ज्ञान, चरित्र त्रिवेणी, जिन शासन में लहारावै. ।
 जो खावे इण में गोता तो, पावन मन बो बण ज्यावै । माला फेरो अर्हम्-अर्हम्, जाप जपो जिनवर रो हरदम । करल्यो प्रतिक्रमण खुल ज्यासी, मन री गांठा गहरी … रंगल्यो… ।।१।।
मैना सुन्दरी श्रीपाल जी, आयम्बिल तप अपनायो ।
 कुष्ठ रोग से मुक्त बण्या, रिद्धि-सिद्धि शुभ फल पायो । सुभट सात सौ तप ने धास्यो, सब रो मन ओ हरसायो । पायो तपस्या रो फल साचो, जो साथै मन स्यूँ ध्यावो । करसी जो इन मन पर संयम, फल पासी रे बो ही अनुपम । लाखां जन री नैया तप स्यूँ, भव पार उतरी … रंगल्यो… ।। २ ।।
जिन शासन ओ बड़ो सुरंगो, महिमा इन री महकाओ । तपस्या थांस्यूं नहीं हुवै तो, तपसी रा गुण सब गाओ । घालो नूंतो जितनी शक्ति, खाली कोई नहीं जाओ । 
बास, एकासण और बीयासण, कुछ तो करके दिखलाओ । सुन्दर तप री लागे जाजम, इण पर बैठे केवल तपसण । देवां आज बधाई सगला भावां स्यूँ भरी … रंगल्यो… ।। ३ ।।

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